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हास्य
याँ न वो ना'रा-ए-तकबीर न वो जोश-ए-सिपाह
सब के सब आप ही पढ़ते रहें सुब्हान-अल्लाह
अकबर इलाहाबादी
नज़्म
नूर-जहाँ के मज़ार पर
और मुरझा के भी आज़ाद न हो सकती थीं
ज़िल्ल-ए-सुबहान की उल्फ़त के भरम की ख़ातिर
साहिर लुधियानवी
नज़्म
बरसात की बहारें
सब मस्त हो रहे पहचान तेरी क़ुदरत
तीतर पुकारते हैं सुबहान तेरी क़ुदरत
नज़ीर अकबराबादी
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ग़ज़ल
बे-इबादत न ख़ुदा बख़्शेगा सुब्हान-अल्लाह
ऐसी फ़िरदौस से हम गुज़रे कि मज़दूर नहीं
मिर्ज़ा रज़ा बर्क़
ग़ज़ल
क्या दिल ओ दीदा भी हरकारे हैं सुब्हान-अल्लाह
लाख पर्दों में कोई हो ये ख़बर लाते हैं











