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ग़ज़ल
अदा जाफ़री
ग़ज़ल
कुछ ज़ेर-ए-लब अल्फ़ाज़ खनकते हैं फ़ज़ा में
गूँजी हुई है बज़्म तिरी कम-सुख़नी से
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
क्या बोलने में उस बुत-ए-काफ़िर की अदा है
शीरीं-सुख़नी इक तरफ़ आवाज़ तो देखो









