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नज़्म
अपनी मल्का-ए-सुख़न से
रू-ए-मुबीं न गेसू-ए-सुम्बुल-क़वाम है
वो बरहमन की सुब्ह ये साक़ी की शाम है
जोश मलीहाबादी
ग़ज़ल
अमीर मीनाई
नज़्म
आधी रात
लबों पे सो गई कलियों की मुस्कुराहट भी
ज़रा भी सुम्बुल-ए-तुर्की लटें नहीं हिलतीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
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ग़ज़ल
दश्त-ए-ग़ुर्बत में रुलाते हैं हमें याद आ कर
ऐ वतन तेरे गुल ओ सुम्बुल ओ रैहाँ क्या क्या
अख़्तर शीरानी
ग़ज़ल
सौदा-ए-ज़ुल्फ़-ए-यार में काफ़िर हुआ हूँ में
सुम्बुल के तार चाहिएँ ज़ुन्नार के लिए
हैदर अली आतिश
ग़ज़ल
आरज़ू लखनवी
ग़ज़ल
शकील बदायूनी
नज़्म
चेहरा तेरा
निकहत-ए-गेसू को तेरी निकहत-ए-सुम्बुल लिखूँ
तेरे नर्म-ओ-नाज़ुक इन होंटों को बर्ग-ए-गुल लिखूँ
जय राज सिंह झाला
ग़ज़ल
मिर्ज़ा जवाँ बख़्त जहाँदार
ग़ज़ल
रुख़ जो ज़ेर-ए-सुंबल-ए-पुर-पेच-ओ-ताब आ जाएगा
फिर के बुर्ज-ए-सुंबले में आफ़्ताब आ जाएगा
बहादुर शाह ज़फ़र
ग़ज़ल
लिपटी है चोटी यार की फूलों के हार में
सुम्बुल ने गुल खिलाए हैं फ़स्ल-ए-बहार में
गोया फ़क़ीर मोहम्मद
नज़्म
नक़्क़ाद
क्यूँ उठा है जिंस-ए-शायर के परखने के लिए
क्या शमीम-ए-सुम्बुल-ओ-नस्रीं है चखने के लिए




