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नज़्म
आदमी-नामा
और चीथडों लगा है सो है वो भी आदमी
हैराँ हूँ यारो देखो तो क्या ये स्वाँग है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
उबैदुल्लाह अलीम
नज़्म
यादें
कभी सिकंदर कभी क़लंदर कभी बगूला कभी ख़याल
स्वाँग रचाए और गुज़र की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
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रेख़्ता शब्दकोश
svaa.ng
स्वाँग سَوانگ
किसी दूसरे की वेश-भूषा अपने अंग पर इसलिए धारण करना कि देखने में लोगों को वही दूसरा व्यक्ति जान पड़े, भेस, रूप
sa.ng-jaa.n
संग-जाँ سَنْگ جاں
जिसके प्राण मुश्किल से निकले, सख्तज, निर्दय, बेरह्म ।।
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नज़्म
मैं
मैं भी दिल के बहलाने को क्या क्या स्वाँग रचाता हूँ
सायों के झुरमुट में बैठा सुख की सेज सजाता हूँ
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
होली
चलते हैं कहीं जाम कहीं स्वाँग का चर्चा
ओ रंग को गलियों में जो देखो तो हर इक जा
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
कैसे कैसे स्वाँग रचाए हम ने दुनिया-दारी में
यूँ ही सारी उमर गँवा दी औरों ग़म-ख़्वारी में
अज़रा नक़वी
ग़ज़ल
सारा मौसम बदल चुका था फूल भी थे और आग भी थी
रात ने जब ये स्वाँग रचाया चाँद भी रूप बदलने लगा
शमीम हनफ़ी
नज़्म
क़ुर्बानी के बकरे
बकरे के पीछे पीछे हैं मजनूँ का भर के स्वाँग
गर हो सके ख़रीदिए बकरे की एक टाँग














