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नज़्म
आदमी-नामा
और चीथडों लगा है सो है वो भी आदमी
हैराँ हूँ यारो देखो तो क्या ये स्वाँग है
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
उबैदुल्लाह अलीम
नज़्म
यादें
स्वाँग रचाए और गुज़र की इस आबाद ख़राबे में
देखो हम ने कैसे बसर की इस आबाद ख़राबे में
अख़्तरुल ईमान
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रेख़्ता शब्दकोश
saa.ns
साँसسانس
प्राणियों का जीवन धारण के लिए नाक या मुंह से हवा अंदर खींचकर फेफड़ों तक पहुँचाने और उसे फिर बाहर निकालने की क्रिया, श्वास, दम, फूंक, दरार, भांप, फूँक, रूह, आत्मा, क्षण, पल
svaa.ng
स्वाँगسَوانگ
किसी दूसरे की वेश-भूषा अपने अंग पर इसलिए धारण करना कि देखने में लोगों को वही दूसरा व्यक्ति जान पड़े, भेस, रूप
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नज़्म
मैं
मैं भी दिल के बहलाने को क्या क्या स्वाँग रचाता हूँ
सायों के झुरमुट में बैठा सुख की सेज सजाता हूँ
मुनीर नियाज़ी
नज़्म
होली
चलते हैं कहीं जाम कहीं स्वाँग का चर्चा
ओ रंग को गलियों में जो देखो तो हर इक जा














