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नज़्म
शिकवा
जुरअत-आमोज़ मिरी ताब-ए-सुख़न है मुझ को
शिकवा अल्लाह से ख़ाकम-ब-दहन है मुझ को
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
तब-ए-आज़ाद पे क़ैद-ए-रमज़ाँ भारी है
तुम्हीं कह दो यही आईन-ए-वफ़ादारी है
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अमीर ख़ुसरो
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नज़्म
दुआ
वो जिन्हें ताब-ए-गिराँ-बारी-ए-अय्याम नहीं
उन की पलकों पे शब ओ रोज़ को हल्का कर दे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
इबलीस की मजलिस-ए-शूरा
तब-ए-मशरिक़ के लिए मौज़ूँ यही अफ़यून थी
वर्ना क़व्वाली से कुछ कम-तर नहीं इल्म-ए-कलाम
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तस्वीर-ए-दर्द
नहीं मिन्नत-कश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरी
ख़मोशी गुफ़्तुगू है बे-ज़बानी है ज़बाँ मेरी
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
अब नहीं ताब-ए-सिपास-ए-हुस्न इस दिल को जिसे
बे-क़रार-ए-शिकव-ए-बेजा समझ बैठे थे हम
फ़िराक़ गोरखपुरी
शेर
अमीर ख़ुसरो
नज़्म
ज़ौक़ ओ शौक़
क़ाफ़िला-ए-हिजाज़ में एक हुसैन भी नहीं
गरचे है ताब-दार अभी गेसू-ए-दजला-ओ-फ़ुरात!
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
इसी कश्मकश में गुज़रीं मिरी ज़िंदगी की रातें
कभी सोज़-ओ-साज़-ए-'रूमी' कभी पेच-ओ-ताब-ए-'राज़ी'
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
वालिदा मरहूमा की याद में
आदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम है
उस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मिर्ज़ा 'ग़ालिब'
ज़िंदगी मुज़्मर है तेरी शोख़ी-ए-तहरीर में
ताब-ए-गोयाई से जुम्बिश है लब-ए-तस्वीर में


