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नज़्म
रिश्वत
वो अगर ठग है तो ये डाकू है वो बट-मार है
आज हर गर्दन में काली जीत का इक हार है
जोश मलीहाबादी
नज़्म
झोंपड़ा
इस में ही चोर-ठग हैं इसी में अमोल हैं
इस में ही रोनी शक्ल इसी में ढिढोल हैं
नज़ीर अकबराबादी
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नज़्म
जवाब-ए-शिकवा
ता-सर-ए-अर्श भी इंसाँ की तग-ओ-ताज़ है क्या
आ गई ख़ाक की चुटकी को भी परवाज़ है क्या
अल्लामा इक़बाल
ग़ज़ल
ये भोग भी एक तपस्या है तुम त्याग के मारे क्या जानो
अपमान रचियता का होगा रचना को अगर ठुकराओगे
साहिर लुधियानवी
नज़्म
होली की बहारें
वो सब सामान मुहय्या हो और बाग़ खिला हो ख़्वाबों का
हर आन शराबें ढलती हों और ठठ हो रंग के डूबों का
नज़ीर अकबराबादी
ग़ज़ल
वो मोहब्बत की शुरू'आत वो बे-थाह ख़ुशी
देख कर उन को वो फूले न समाना दिल का
पीर सय्यद नसीरुद्दीन नसीर गीलानी
ग़ज़ल
मंज़िलें गर्द की मानिंद उड़ी जाती हैं
अबलक़-ए-दहर कुछ अंदाज़-ए-तग-ओ-ताज़ तो दे
