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ग़ज़ल
अनवर मिर्ज़ापुरी
नज़्म
आज की रात
क़स्र-ए-गीती में उमँड आया है तूफ़ान-ए-हयात
मौत लर्ज़ां है पस-ए-पर्दा-ए-दर आज की रात
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
बरसात की बहारें
झड़ कर रही हैं झड़ियाँ नाले उमँड रहे हैं
बरसे है मुँह झड़ा झड़ बादल घुमंड रहे हैं
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
एक ग़मगीन याद
उमँड आते थे जब अश्क-ए-मोहब्बत उस की पलकों तक
टपकती थी दर-ओ-दीवार से शोख़ी तबस्सुम की
असरार-उल-हक़ मजाज़
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नज़्म
नर्गिस-ए-मस्ताना
जब तक करम-ए-ख़ास का दरिया न उमँड आए
तू और भी हाल अपना सफ़ीहाना बना दे
जिगर मुरादाबादी
ग़ज़ल
उमँड आई है क्यूँ तारीक शब अतराफ़-ए-आलम पर
कहाँ गुम हो गए शम्स-ओ-क़मर आहिस्ता आहिस्ता
मुज़फ्फ़र अहमद मुज़फ्फ़र
ग़ज़ल
अश्क-ए-ग़म ऐसे नहीं हैं जो उमँड कर रह जाएँ
हैं ये तूफ़ान मिरे सर से गुज़रने वाले
रियाज़ ख़ैराबादी
नज़्म
ईद का मेला
सब उजला शहर उमँड आया शलवार सजा दस्तार लगा
इस भीड़ के बिफरे तूफ़ाँ में जो डूब गया सो पार लगा
सय्यद ज़मीर जाफ़री
नज़्म
ख़ुश्क-साली
आह की और दिल उमँड आया ये होता ही नहीं
डूब कर ज़ौक़-ए-फ़ना में कोई रोता ही नहीं
जोश मलीहाबादी
नज़्म
राह-ए-फ़रार
सियह, मार जैसे, चमकते हुए काले बालों
पे ऐसी सपीदी उमँड आएगी कुछ तदारुक नहीं जिस का कोई
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
मर्सिया गोपाल कृष्ण गोखले
वतन की जान पे क्या क्या तबाहियाँ आईं
उमँड उमँड के जिहालत की बदलियाँ आईं










