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लेख
शम्सुर रहमान फ़ारूक़ी
ग़ज़ल
वाए नादानी कि वक़्त-ए-मर्ग ये साबित हुआ
ख़्वाब था जो कुछ कि देखा जो सुना अफ़्साना था
ख़्वाजा मीर दर्द
हिंदी ग़ज़ल
वे सहारे भी नहीं अब जंग लड़नी है तुझे
कट चुके जो हाथ उन हाथों में तलवारें न देख






