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ग़ज़ल
मैं ऐसे शख़्स को ज़िंदों में क्या शुमार करूँ
जो सोचता भी नहीं ख़्वाब देखता भी नहीं
पीरज़ादा क़ासिम
ग़ज़ल
बहुत दिनों से मैं ज़िंदों में था न मुर्दों में
ग़ज़ल हुई तो मिरे दश्त में ग़ज़ाल आया
शहज़ाद अहमद
नज़्म
शब-बरात
ज़िंदों की है ज़बाँ की मज़ेदारी शब-बरात
मुर्दों की रूह की है मदद-गारी शब-बरात
नज़ीर अकबराबादी
हास्य
सिर्फ़ ज़िंदों ही को फ़िक्र-ए-ऐश-ओ-आसाइश नहीं
अब तो इस दुनिया में मुर्दों की भी गुंजाइश नहीं
दिलावर फ़िगार
नज़्म
मक़्तल की ईद-ए-क़ुर्बां
कितने आदाब से मक़्तल को सजाया गया है
फिर तिरी बज़्म से ज़िंदों को उठाया गया है
खुर्शीद अकबर
नज़्म
नाम ओ नसब
गर वो ज़िंदा थे तो ज़िंदों में वो शामिल कब थे
और मरने पे फ़क़त बोझ थी मय्यत उन की

