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नज़्म
चीरे के बीच में चीरा है और पटके बीच जो है पटका
क्या कहिए और 'नज़ीर' आगे है ज़ोर तमाशा झट-पटका
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
तमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत है
हज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरें
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तिरी चीन-ए-जबीं ख़ुद इक सज़ा क़ानून-ए-फ़ितरत में
इसी शमशीर से कार-ए-सज़ा लेती तो अच्छा था
असरार-उल-हक़ मजाज़
नज़्म
चटानें चीर कर दरिया निकाले ख़ाक-ए-असफ़ल से
मिरी तख़्लीक़ की मुझ को जहाँ की पासबानी दी
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
वो माँ कि आयत-ए-रहमत है जिस की चीन-ए-जबीं
वो माँ कि हाँ से भी होती है बढ़ के जिस की नहीं
फ़िराक़ गोरखपुरी
नज़्म
दिल में जितना आए लूटें क़ौम को शाह-ओ-वज़ीर
खींच ले ख़ंजर कोई जोड़े कोई चिल्ले में तीर