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नज़्म
ज़ेहरा निगाह
नज़्म
नीस्त पैग़मबर व-लेकिन दर बग़ल दारद किताब
क्या बताऊँ क्या है काफ़िर की निगाह-ए-पर्दा-सोज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
हो गया मानिंद-ए-आब अर्ज़ां मुसलमाँ का लहू
मुज़्तरिब है तू कि तेरा दिल नहीं दाना-ए-राज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
गुड़गुड़ाती हुई पान की पीकों में वो दाद वो वाह वा
चंद दरवाज़ों पे लटके हुए बोसीदा से कुछ टाट के पर्दे
गुलज़ार
नज़्म
वो हाकिम क़ादिर-ए-मुतलक़ है यकता और दाना है
अँधेरे को उजाले से जुदा करता है ख़ुद को मैं
अख़्तरुल ईमान
नज़्म
क्यूँ दाद-ए-ग़म हमीं ने तलब की बुरा किया
हम से जहाँ में कुश्ता-ए-ग़म और क्या न थे
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
वो माँ मैं जिस से शरारत की दाद पा न सका
मैं जिस के हाथों मोहब्बत की मार खा न सका