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नज़्म
क़अर-ए-वहशत की तरफ़ मुड़ती है अक्सर राह-ए-फ़न
झाँकती रहती है इस ग़ुर्फ़े से चश्म-ए-अहरमन
जोश मलीहाबादी
नज़्म
जाता हूँ इजाज़त वो देखो ग़ुर्फ़े से शुआएँ झलकी हैं
पिघले हुए सोने की लहरें मीना-ए-शफ़क़ से छलकी हैं
मजीद अमजद
नज़्म
यूसुफ़ ज़फ़र
नज़्म
मुज़्तरिब-बाग़ के हर ग़ुंचे में है बू-ए-नियाज़
तू ज़रा छेड़ तो दे तिश्ना-ए-मिज़राब है साज़
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
यूँ गुमाँ होता है गरचे है अभी सुब्ह-ए-फ़िराक़
ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात
फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
नज़्म
ख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर दे
कि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी है
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
गरचे मिल-बैठेंगे हम तुम तो मुलाक़ात के बा'द
अपना एहसास-ए-ज़ियाँ और ज़ियादा होगा