aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere
परिणाम "mujmal"
चश्म-ए-नम जान-ए-शोरीदा काफ़ी नहींतोहमत-ए-इश्क़-ए-पोशीदा काफ़ी नहींआज बाज़ार में पा-ब-जौलाँ चलोदस्त-अफ़्शाँ चलो मस्त ओ रक़्साँ चलोख़ाक-बर-सर चलो ख़ूँ-ब-दामाँ चलोराह तकता है सब शहर-ए-जानाँ चलोहाकिम-ए-शहर भी मजमा-ए-आम भीतीर-ए-इल्ज़ाम भी संग-ए-दुश्नाम भीसुब्ह-ए-नाशाद भी रोज़-ए-नाकाम भीउन का दम-साज़ अपने सिवा कौन हैशहर-ए-जानाँ में अब बा-सफ़ा कौन हैदस्त-ए-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
दलील-ए-सुब्ह-ए-रौशन है सितारों की तुनुक-ताबीउफ़ुक़ से आफ़्ताब उभरा गया दौर-ए-गिराँ-ख़्वाबीउरूक़-मुर्दा-ए-मशरिक़ में ख़ून-ए-ज़िंदगी दौड़ासमझ सकते नहीं इस राज़ को सीना ओ फ़ाराबीमुसलमाँ को मुसलमाँ कर दिया तूफ़ान-ए-मग़रिब नेतलातुम-हा-ए-दरिया ही से है गौहर की सैराबीअता मोमिन को फिर दरगाह-ए-हक़ से होने वाला हैशिकोह-ए-तुर्कमानी ज़ेहन हिन्दी नुत्क़ आराबीअसर कुछ ख़्वाब का ग़ुंचों में बाक़ी है तू ऐ बुलबुलनवा-रा तल्ख़-तरमी ज़न चू ज़ौक़-ए-नग़्मा कम-याबीतड़प सेहन-ए-चमन में आशियाँ में शाख़-सारों मेंजुदा पारे से हो सकती नहीं तक़दीर-ए-सीमाबीवो चश्म-ए-पाक हैं क्यूँ ज़ीनत-ए-बर-गुस्तवाँ देखेनज़र आती है जिस को मर्द-ए-ग़ाज़ी की जिगर-ताबीज़मीर-ए-लाला में रौशन चराग़-ए-आरज़ू कर देचमन के ज़र्रे ज़र्रे को शहीद-ए-जुस्तुजू कर देसरिश्क-ए-चश्म-ए-मुस्लिम में है नैसाँ का असर पैदाख़लीलुल्लाह के दरिया में होंगे फिर गुहर पैदाकिताब-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा की फिर शीराज़ा-बंदी हैये शाख़-ए-हाशमी करने को है फिर बर्ग-ओ-बर पैदारबूद आँ तुर्क शीराज़ी दिल-ए-तबरेज़-ओ-काबुल रासबा करती है बू-ए-गुल से अपना हम-सफ़र पैदाअगर उस्मानियों पर कोह-ए-ग़म टूटा तो क्या ग़म हैकि ख़ून-ए-सद-हज़ार-अंजुम से होती है सहर पैदाजहाँबानी से है दुश्वार-तर कार-ए-जहाँ-बीनीजिगर ख़ूँ हो तो चश्म-ए-दिल में होती है नज़र पैदाहज़ारों साल नर्गिस अपनी बे-नूरी पे रोती हैबड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदा-वर पैदानवा-पैरा हो ऐ बुलबुल कि हो तेरे तरन्नुम सेकबूतर के तन-ए-नाज़ुक में शाहीं का जिगर पैदातिरे सीने में है पोशीदा राज़-ए-ज़िंदगी कह देमुसलमाँ से हदीस-ए-सोज़-ओ-साज़-ए-ज़िंदगी कह देख़ुदा-ए-लम-यज़ल का दस्त-ए-क़ुदरत तू ज़बाँ तू हैयक़ीं पैदा कर ऐ ग़ाफ़िल कि मग़लूब-ए-गुमाँ तू हैपरे है चर्ख़-ए-नीली-फ़ाम से मंज़िल मुसलमाँ कीसितारे जिस की गर्द-ए-राह हों वो कारवाँ तो हैमकाँ फ़ानी मकीं फ़ानी अज़ल तेरा अबद तेराख़ुदा का आख़िरी पैग़ाम है तू जावेदाँ तू हैहिना-बंद-ए-उरूस-ए-लाला है ख़ून-ए-जिगर तेरातिरी निस्बत बराहीमी है मेमार-ए-जहाँ तू हैतिरी फ़ितरत अमीं है मुम्किनात-ए-ज़िंदगानी कीजहाँ के जौहर-ए-मुज़्मर का गोया इम्तिहाँ तो हैजहान-ए-आब-ओ-गिल से आलम-ए-जावेद की ख़ातिरनबुव्वत साथ जिस को ले गई वो अरमुग़ाँ तू हैये नुक्ता सरगुज़िश्त-ए-मिल्लत-ए-बैज़ा से है पैदाकि अक़्वाम-ए-ज़मीन-ए-एशिया का पासबाँ तू हैसबक़ फिर पढ़ सदाक़त का अदालत का शुजाअ'त कालिया जाएगा तुझ से काम दुनिया की इमामत कायही मक़्सूद-ए-फ़ितरत है यही रम्ज़-ए-मुसलमानीउख़ुव्वत की जहाँगीरी मोहब्बत की फ़रावानीबुतान-ए-रंग-ओ-ख़ूँ को तोड़ कर मिल्लत में गुम हो जान तूरानी रहे बाक़ी न ईरानी न अफ़्ग़ानीमियान-ए-शाख़-साराँ सोहबत-ए-मुर्ग़-ए-चमन कब तकतिरे बाज़ू में है परवाज़-ए-शाहीन-ए-क़हस्तानीगुमाँ-आबाद हस्ती में यक़ीं मर्द-ए-मुसलमाँ काबयाबाँ की शब-ए-तारीक में क़िंदील-ए-रुहबानीमिटाया क़ैसर ओ किसरा के इस्तिब्दाद को जिस नेवो क्या था ज़ोर-ए-हैदर फ़क़्र-ए-बू-ज़र सिद्क़-ए-सलमानीहुए अहरार-ए-मिल्लत जादा-पैमा किस तजम्मुल सेतमाशाई शिगाफ़-ए-दर से हैं सदियों के ज़िंदानीसबात-ए-ज़िंदगी ईमान-ए-मोहकम से है दुनिया मेंकि अल्मानी से भी पाएँदा-तर निकला है तूरानीजब इस अँगारा-ए-ख़ाकी में होता है यक़ीं पैदातो कर लेता है ये बाल-ओ-पर-ए-रूह-उल-अमीं पैदाग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरेंजो हो ज़ौक़-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरेंकोई अंदाज़ा कर सकता है उस के ज़ोर-ए-बाज़ू कानिगाह-ए-मर्द-ए-मोमिन से बदल जाती हैं तक़दीरेंविलायत पादशाही इल्म-ए-अशिया की जहाँगीरीये सब क्या हैं फ़क़त इक नुक्ता-ए-ईमाँ की तफ़्सीरेंबराहीमी नज़र पैदा मगर मुश्किल से होती हैहवस छुप छुप के सीनों में बना लेती है तस्वीरेंतमीज़-ए-बंदा-ओ-आक़ा फ़साद-ए-आदमियत हैहज़र ऐ चीरा-दस्ताँ सख़्त हैं फ़ितरत की ताज़ीरेंहक़ीक़त एक है हर शय की ख़ाकी हो कि नूरी होलहू ख़ुर्शीद का टपके अगर ज़र्रे का दिल चीरेंयक़ीं मोहकम अमल पैहम मोहब्बत फ़ातेह-ए-आलमजिहाद-ए-ज़िंदगानी में हैं ये मर्दों की शमशीरेंचे बायद मर्द रा तब-ए-बुलंद मशरब-ए-नाबेदिल-ए-गरमे निगाह-ए-पाक-बीने जान-ए-बेताबेउक़ाबी शान से झपटे थे जो बे-बाल-ओ-पर निकलेसितारे शाम के ख़ून-ए-शफ़क़ में डूब कर निकलेहुए मदफ़ून-ए-दरिया ज़ेर-ए-दरिया तैरने वालेतमांचे मौज के खाते थे जो बन कर गुहर निकलेग़ुबार-ए-रहगुज़र हैं कीमिया पर नाज़ था जिन कोजबीनें ख़ाक पर रखते थे जो इक्सीर-गर निकलेहमारा नर्म-रौ क़ासिद पयाम-ए-ज़िंदगी लायाख़बर देती थीं जिन को बिजलियाँ वो बे-ख़बर निकलेहरम रुस्वा हुआ पीर-ए-हरम की कम-निगाही सेजवानान-ए-ततारी किस क़दर साहब-नज़र निकलेज़मीं से नूरयान-ए-आसमाँ-परवाज़ कहते थेये ख़ाकी ज़िंदा-तर पाएँदा-तर ताबिंदा-तर निकलेजहाँ में अहल-ए-ईमाँ सूरत-ए-ख़ुर्शीद जीते हैंइधर डूबे उधर निकले उधर डूबे इधर निकलेयक़ीं अफ़राद का सरमाया-ए-तामीर-ए-मिल्लत हैयही क़ुव्वत है जो सूरत-गर-ए-तक़दीर-ए-मिल्लत हैतू राज़-ए-कुन-फ़काँ है अपनी आँखों पर अयाँ हो जाख़ुदी का राज़-दाँ हो जा ख़ुदा का तर्जुमाँ हो जाहवस ने कर दिया है टुकड़े टुकड़े नौ-ए-इंसाँ कोउख़ुव्वत का बयाँ हो जा मोहब्बत की ज़बाँ हो जाये हिन्दी वो ख़ुरासानी ये अफ़्ग़ानी वो तूरानीतू ऐ शर्मिंदा-ए-साहिल उछल कर बे-कराँ हो जाग़ुबार-आलूदा-ए-रंग-ओ-नसब हैं बाल-ओ-पर तेरेतू ऐ मुर्ग़-ए-हरम उड़ने से पहले पर-फ़िशाँ हो जाख़ुदी में डूब जा ग़ाफ़िल ये सिर्र-ए-ज़िंदगानी हैनिकल कर हल्क़ा-ए-शाम-ओ-सहर से जावेदाँ हो जामसाफ़-ए-ज़िंदगी में सीरत-ए-फ़ौलाद पैदा करशबिस्तान-ए-मोहब्बत में हरीर ओ पर्नियाँ हो जागुज़र जा बन के सैल-ए-तुंद-रौ कोह ओ बयाबाँ सेगुलिस्ताँ राह में आए तो जू-ए-नग़्मा-ख़्वाँ हो जातिरे इल्म ओ मोहब्बत की नहीं है इंतिहा कोईनहीं है तुझ से बढ़ कर साज़-ए-फ़ितरत में नवा कोईअभी तक आदमी सैद-ए-ज़बून-ए-शहरयारी हैक़यामत है कि इंसाँ नौ-ए-इंसाँ का शिकारी हैनज़र को ख़ीरा करती है चमक तहज़ीब-ए-हाज़िर कीये सन्नाई मगर झूटे निगूँ की रेज़ा-कारी हैवो हिकमत नाज़ था जिस पर ख़िरद-मंदान-ए-मग़रिब कोहवस के पंजा-ए-ख़ूनीं में तेग़-ए-कार-ज़ारी हैतदब्बुर की फ़ुसूँ-कारी से मोहकम हो नहीं सकताजहाँ में जिस तमद्दुन की बिना सरमाया-दारी हैअमल से ज़िंदगी बनती है जन्नत भी जहन्नम भीये ख़ाकी अपनी फ़ितरत में न नूरी है न नारी हैख़रोश-आमोज़ बुलबुल हो गिरह ग़ुंचे की वा कर देकि तू इस गुल्सिताँ के वास्ते बाद-ए-बहारी हैफिर उट्ठी एशिया के दिल से चिंगारी मोहब्बत कीज़मीं जौलाँ-गह-ए-अतलस क़बायान-ए-तातारी हैबया पैदा ख़रीदा रास्त जान-ए-ना-वान-ए-रापस अज़ मुद्दत गुज़ार उफ़्ताद बर्मा कारवाने राबया साक़ी नवा-ए-मुर्ग़-ज़ार अज़ शाख़-सार आमदबहार आमद निगार आमद निगार आमद क़रार आमदकशीद अब्र-ए-बहारी ख़ेमा अंदर वादी ओ सहरासदा-ए-आबशाराँ अज़ फ़राज़-ए-कोह-सार आमदसरत गर्दम तोहम क़ानून पेशीं साज़ दह साक़ीकि ख़ैल-ए-नग़्मा-पर्दाज़ाँ क़तार अंदर क़तार आमदकनार अज़ ज़ाहिदाँ बर-गीर ओ बेबाकाना साग़र-कशपस अज़ मुद्दत अज़ीं शाख़-ए-कुहन बाँग-ए-हज़ार आमदब-मुश्ताक़ाँ हदीस-ए-ख़्वाजा-ए-बदरौ हुनैन आवरतसर्रुफ़-हा-ए-पिन्हानश ब-चश्म-ए-आश्कार आमददिगर शाख़-ए-ख़लील अज़ ख़ून-ए-मा नमनाक मी गर्ददब-बाज़ार-ए-मोहब्बत नक़्द-ए-मा कामिल अय्यार आमदसर-ए-ख़ाक-ए-शाहीरे बर्ग-हा-ए-लाला मी पाशमकि ख़ूनश बा-निहाल-ए-मिल्लत-ए-मा साज़गार आमदबया ता-गुल बा-अफ़ोशनीम ओ मय दर साग़र अंदाज़ेमफ़लक रा सक़्फ़ ब-शागाफ़ेम ओ तरह-ए-दीगर अंदाज़ेम
ये धूम-धड़क्का साथ लिए क्यूँ फिरता है जंगल जंगलइक तिनका साथ न जावेगा मौक़ूफ़ हुआ जब अन्न और जलघर-बार अटारी चौपारी क्या ख़ासा नैन-सुख और मलमलचलवन पर्दे फ़र्श नए क्या लाल पलंग और रंग-महलसब ठाठ पड़ा रह जावेगा जब लाद चलेगा बंजारा
साक़ी की हर निगाह पे बल खा के पी गयालहरों से खेलता हुआ लहरा के पी गयाबे-कैफ़ियों के कैफ़ से घबरा के पी गयातौबा को तोड़-ताड़ के थर्रा के पी गयाज़ाहिद! ये तेरी शोख़ी-ए-रिन्दाना देखनारहमत को बातों बातों में बहला के पी गयासर-मस्ती-ए-अज़ल मुझे जब याद आ गईदुनिया-ए-ए'तिबार को ठुकरा के पी गयाआज़ुर्दगी-ए-ख़ातिर-ए-साक़ी को देख करमुझ को ये शर्म आई कि शर्मा के पी गयाऐ रहमत-ए-तमाम मिरी हर ख़ता मुआफ़मैं इंतिहा-ए-शौक़ में घबरा के पी गयापीता बग़ैर इज़्न ये कब थी मिरी मजालदर-पर्दा चश्म-ए-यार की शह पा के पी गयाउस जान-ए-मय-कदा की क़सम बारहा 'जिगर'कुल आलम-ए-बसीत पे मैं छा के पी गया
ज़र्रा ज़र्रा दहर का ज़िंदानी-ए-तक़दीर हैपर्दा-ए-मजबूरी ओ बेचारगी तदबीर हैआसमाँ मजबूर है शम्स ओ क़मर मजबूर हैंअंजुम-ए-सीमाब-पा रफ़्तार पर मजबूर हैंहै शिकस्त अंजाम ग़ुंचे का सुबू गुलज़ार मेंसब्ज़ा ओ गुल भी हैं मजबूर-ए-नमू गुलज़ार मेंनग़्मा-ए-बुलबुल हो या आवाज़-ए-ख़ामोश-ए-ज़मीरहै इसी ज़ंजीर-ए-आलम-गीर में हर शय असीरआँख पर होता है जब ये सिर्र-ए-मजबूरी अयाँख़ुश्क हो जाता है दिल में अश्क का सैल-ए-रवाँक़ल्ब-ए-इंसानी में रक़्स-ए-ऐश-ओ-ग़म रहता नहींनग़्मा रह जाता है लुत्फ़-ए-ज़ेर-ओ-बम रहता नहींइल्म ओ हिकमत रहज़न-ए-सामान-ए-अश्क-ओ-आह हैया'नी इक अल्मास का टुकड़ा दिल-ए-आगाह हैगरचे मेरे बाग़ में शबनम की शादाबी नहींआँख मेरी माया-दार-ए-अश्क-ए-उननाबी नहींजानता हूँ आह में आलाम-ए-इंसानी का राज़है नवा-ए-शिकवा से ख़ाली मिरी फ़ितरत का साज़मेरे लब पर क़िस्सा-ए-नैरंगी-ए-दौराँ नहींदिल मिरा हैराँ नहीं ख़ंदा नहीं गिर्यां नहींपर तिरी तस्वीर क़ासिद गिर्या-ए-पैहम की हैआह ये तरदीद मेरी हिकमत-ए-मोहकम की हैगिर्या-ए-सरशार से बुनियाद-ए-जाँ पाइंदा हैदर्द के इरफ़ाँ से अक़्ल-ए-संग-दिल शर्मिंदा हैमौज-ए-दूद-ए-आह से आईना है रौशन मिरागंज-ए-आब-आवर्द से मामूर है दामन मिराहैरती हूँ मैं तिरी तस्वीर के ए'जाज़ कारुख़ बदल डाला है जिस ने वक़्त की परवाज़ कारफ़्ता ओ हाज़िर को गोया पा-ब-पा इस ने कियाअहद-ए-तिफ़्ली से मुझे फिर आश्ना इस ने कियाजब तिरे दामन में पलती थी वो जान-ए-ना-तवाँबात से अच्छी तरह महरम न थी जिस की ज़बाँऔर अब चर्चे हैं जिस की शोख़ी-ए-गुफ़्तार केबे-बहा मोती हैं जिस की चश्म-ए-गौहर-बार केइल्म की संजीदा-गुफ़्तारी बुढ़ापे का शुऊ'रदुनयवी ए'ज़ाज़ की शौकत जवानी का ग़ुरूरज़िंदगी की ओज-गाहों से उतर आते हैं हमसोहबत-ए-मादर में तिफ़्ल-ए-सादा रह जाते हैं हमबे-तकल्लुफ़ ख़ंदा-ज़न हैं फ़िक्र से आज़ाद हैंफिर उसी खोए हुए फ़िरदौस में आबाद हैंकिस को अब होगा वतन में आह मेरा इंतिज़ारकौन मेरा ख़त न आने से रहेगा बे-क़रारख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगाअब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगातर्बियत से तेरी में अंजुम का हम-क़िस्मत हुआघर मिरे अज्दाद का सरमाया-ए-इज़्ज़त हुआदफ़्तर-ए-हस्ती में थी ज़र्रीं वरक़ तेरी हयातथी सरापा दीन ओ दुनिया का सबक़ तेरी हयातउम्र भर तेरी मोहब्बत मेरी ख़िदमत-गर रहीमैं तिरी ख़िदमत के क़ाबिल जब हुआ तू चल बसीवो जवाँ-क़ामत में है जो सूरत-ए-सर्व-ए-बुलंदतेरी ख़िदमत से हुआ जो मुझ से बढ़ कर बहरा-मंदकारोबार-ए-ज़िंदगानी में वो हम-पहलू मिरावो मोहब्बत में तिरी तस्वीर वो बाज़ू मिरातुझ को मिस्ल-ए-तिफ़्लक-ए-बे-दस्त-ओ-पा रोता है वोसब्र से ना-आश्ना सुब्ह ओ मसा रोता है वोतुख़्म जिस का तू हमारी किश्त-ए-जाँ में बो गईशिरकत-ए-ग़म से वो उल्फ़त और मोहकम हो गईआह ये दुनिया ये मातम-ख़ाना-ए-बरना-ओ-पीरआदमी है किस तिलिस्म-ए-दोश-ओ-फ़र्दा में असीरकितनी मुश्किल ज़िंदगी है किस क़दर आसाँ है मौतगुलशन-ए-हस्ती में मानिंद-ए-नसीम अर्ज़ां है मौतज़लज़ले हैं बिजलियाँ हैं क़हत हैं आलाम हैंकैसी कैसी दुख़्तरान-ए-मादर-ए-अय्याम हैंकल्ब-ए-इफ़्लास में दौलत के काशाने में मौतदश्त ओ दर में शहर में गुलशन में वीराने में मौतमौत है हंगामा-आरा क़ुलज़ुम-ए-ख़ामोश मेंडूब जाते हैं सफ़ीने मौज की आग़ोश मेंने मजाल-ए-शिकवा है ने ताक़त-ए-गुफ़्तार हैज़िंदगानी क्या है इक तोक़-ए-गुलू-अफ़्शार हैक़ाफ़िले में ग़ैर फ़रियाद-ए-दिरा कुछ भी नहींइक मता-ए-दीदा-ए-तर के सिवा कुछ भी नहींख़त्म हो जाएगा लेकिन इम्तिहाँ का दौर भीहैं पस-ए-नौह पर्दा-ए-गर्दूं अभी दौर और भीसीना चाक इस गुल्सिताँ में लाला-ओ-गुल हैं तो क्यानाला ओ फ़रियाद पर मजबूर बुलबुल हैं तो क्याझाड़ियाँ जिन के क़फ़स में क़ैद है आह-ए-ख़िज़ाँसब्ज़ कर देगी उन्हें बाद-ए-बहार-ए-जावेदाँख़ुफ़्ता-ख़ाक-ए-पय सिपर में है शरार अपना तो क्याआरज़ी महमिल है ये मुश्त-ए-ग़ुबार अपना तो क्याज़िंदगी की आग का अंजाम ख़ाकिस्तर नहींटूटना जिस का मुक़द्दर हो ये वो गौहर नहींज़िंदगी महबूब ऐसी दीदा-ए-क़ुदरत में हैज़ौक़-ए-हिफ़्ज़-ए-ज़िंदगी हर चीज़ की फ़ितरत में हैमौत के हाथों से मिट सकता अगर नक़्श-ए-हयातआम यूँ उस को न कर देता निज़ाम-ए-काएनातहै अगर अर्ज़ां तो ये समझो अजल कुछ भी नहींजिस तरह सोने से जीने में ख़लल कुछ भी नहींआह ग़ाफ़िल मौत का राज़-ए-निहाँ कुछ और हैनक़्श की ना-पाएदारी से अयाँ कुछ और हैजन्नत-ए-नज़ारा है नक़्श-ए-हवा बाला-ए-आबमौज-ए-मुज़्तर तोड़ कर ता'मीर करती है हबाबमौज के दामन में फिर उस को छुपा देती है येकितनी बेदर्दी से नक़्श अपना मिटा देती है येफिर न कर सकती हबाब अपना अगर पैदा हवातोड़ने में उस के यूँ होती न बे-परवा हवाइस रविश का क्या असर है हैयत-ए-तामीर परये तो हुज्जत है हवा की क़ुव्वत-ए-तामीर परफ़ितरत-ए-हस्ती शहीद-ए-आरज़ू रहती न होख़ूब-तर पैकर की उस को जुस्तुजू रहती न होआह सीमाब-ए-परेशाँ अंजुम-ए-गर्दूं-फ़रोज़शोख़ ये चिंगारियाँ ममनून-ए-शब है जिन का सोज़अक़्ल जिस से सर-ब-ज़ानू है वो मुद्दत इन की हैसरगुज़िश्त-ए-नौ-ए-इंसाँ एक साअ'त उन की हैफिर ये इंसाँ आँ सू-ए-अफ़्लाक है जिस की नज़रक़ुदसियों से भी मक़ासिद में है जो पाकीज़ा-तरजो मिसाल-ए-शम्अ रौशन महफ़िल-ए-क़ुदरत में हैआसमाँ इक नुक़्ता जिस की वुसअत-ए-फ़ितरत में हैजिस की नादानी सदाक़त के लिए बेताब हैजिस का नाख़ुन साज़-ए-हस्ती के लिए मिज़राब हैशो'ला ये कम-तर है गर्दूं के शरारों से भी क्याकम-बहा है आफ़्ताब अपना सितारों से भी क्यातुख़्म-ए-गुल की आँख ज़ेर-ए-ख़ाक भी बे-ख़्वाब हैकिस क़दर नश्व-ओ-नुमा के वास्ते बेताब हैज़िंदगी का शो'ला इस दाने में जो मस्तूर हैख़ुद-नुमाई ख़ुद-फ़ज़ाई के लिए मजबूर हैसर्दी-ए-मरक़द से भी अफ़्सुर्दा हो सकता नहींख़ाक में दब कर भी अपना सोज़ खो सकता नहींफूल बन कर अपनी तुर्बत से निकल आता है येमौत से गोया क़बा-ए-ज़िंदगी पाता है येहै लहद इस क़ुव्वत-ए-आशुफ़्ता की शीराज़ा-बंदडालती है गर्दन-ए-गर्दूं में जो अपनी कमंदमौत तज्दीद-ए-मज़ाक़-ए-ज़िंदगी का नाम हैख़्वाब के पर्दे में बेदारी का इक पैग़ाम हैख़ूगर-ए-परवाज़ को परवाज़ में डर कुछ नहींमौत इस गुलशन में जुज़ संजीदन-ए-पर कुछ नहींकहते हैं अहल-ए-जहाँ दर्द-ए-अजल है ला-दवाज़ख़्म-ए-फ़ुर्क़त वक़्त के मरहम से पाता है शिफ़ादिल मगर ग़म मरने वालों का जहाँ आबाद हैहल्क़ा-ए-ज़ंजीर-ए-सुब्ह-ओ-शाम से आज़ाद हैवक़्त के अफ़्सूँ से थमता नाला-ए-मातम नहींवक़्त ज़ख़्म-ए-तेग़-ए-फ़ुर्क़त का कोई मरहम नहींसर पे आ जाती है जब कोई मुसीबत ना-गहाँअश्क पैहम दीदा-ए-इंसाँ से होते हैं रवाँरब्त हो जाता है दिल को नाला ओ फ़रियाद सेख़ून-ए-दिल बहता है आँखों की सरिश्क-आबाद सेआदमी ताब-ए-शकेबाई से गो महरूम हैउस की फ़ितरत में ये इक एहसास-ए-ना-मालूम हैजौहर-ए-इंसाँ अदम से आश्ना होता नहींआँख से ग़ाएब तो होता है फ़ना होता नहींरख़्त-ए-हस्ती ख़ाक-ए-ग़म की शो'ला-अफ़्शानी से हैसर्द ये आग इस लतीफ़ एहसास के पानी से हैआह ये ज़ब्त-ए-फ़ुग़ाँ ग़फ़्लत की ख़ामोशी नहींआगही है ये दिलासाई फ़रामोशी नहींपर्दा-ए-मशरिक़ से जिस दम जल्वा-गर होती है सुब्हदाग़ शब का दामन-ए-आफ़ाक़ से धोती है सुब्हलाला-ए-अफ़्सुर्दा को आतिश-क़बा करती है येबे-ज़बाँ ताइर को सरमस्त-ए-नवा करती है येसीना-ए-बुलबुल के ज़िंदाँ से सरोद आज़ाद हैसैकड़ों नग़्मों से बाद-ए-सुब्ह-दम-आबाद हैख़ुफ़्तगान-ए-लाला-ज़ार ओ कोहसार ओ रूद बारहोते हैं आख़िर उरूस-ए-ज़िंदगी से हम-कनारये अगर आईन-ए-हस्ती है कि हो हर शाम सुब्हमरक़द-ए-इंसाँ की शब का क्यूँ न हो अंजाम सुब्हदाम-ए-सिमीन-ए-तख़य्युल है मिरा आफ़ाक़-गीरकर लिया है जिस से तेरी याद को मैं ने असीरयाद से तेरी दिल-ए-दर्द आश्ना मामूर हैजैसे का'बे में दुआओं से फ़ज़ा मामूर हैवो फ़राएज़ का तसलसुल नाम है जिस का हयातजल्वा-गाहें उस की हैं लाखों जहान-ए-बे-सबातमुख़्तलिफ़ हर मंज़िल-ए-हस्ती को रस्म-ओ-राह हैआख़िरत भी ज़िंदगी की एक जौलाँ-गाह हैहै वहाँ बे-हासिली किश्त-ए-अजल के वास्तेसाज़गार आब-ओ-हवा तुख़्म-ए-अमल के वास्तेनूर-ए-फ़ितरत ज़ुल्मत-ए-पैकर का ज़िंदानी नहींतंग ऐसा हल्क़ा-ए-अफ़कार-ए-इंसानी नहींज़िंदगानी थी तिरी महताब से ताबिंदा-तरख़ूब-तर था सुब्ह के तारे से भी तेरा सफ़रमिस्ल-ए-ऐवान-ए-सहर मरक़द फ़रोज़ाँ हो तिरानूर से मामूर ये ख़ाकी शबिस्ताँ हो तिराआसमाँ तेरी लहद पर शबनम-अफ़्शानी करेसब्ज़ा-ए-नौ-रस्ता इस घर की निगहबानी करे
बस तिरा नाम ही मुकम्मल हैइस से बेहतर भी नज़्म क्या होगी!
फ़िक्र-ए-इंसाँ पर तिरी हस्ती से ये रौशन हुआहै पर-ए-मुर्ग़-ए-तख़य्युल की रसाई ता-कुजाथा सरापा रूह तू बज़्म-ए-सुख़न पैकर तिराज़ेब-ए-महफ़िल भी रहा महफ़िल से पिन्हाँ भी रहादीद तेरी आँख को उस हुस्न की मंज़ूर हैबन के सोज़-ए-ज़िंदगी हर शय में जो मस्तूर हैमहफ़िल-ए-हस्ती तिरी बरबत से है सरमाया-दारजिस तरह नद्दी के नग़्मों से सुकूत-ए-कोहसारतेरे फ़िरदौस-ए-तख़य्युल से है क़ुदरत की बहारतेरी किश्त-ए-फ़िक्र से उगते हैं आलम सब्ज़ा-वारज़िंदगी मुज़्मर है तेरी शोख़ी-ए-तहरीर मेंताब-ए-गोयाई से जुम्बिश है लब-ए-तस्वीर मेंनुत्क़ को सौ नाज़ हैं तेरे लब-ए-एजाज़ परमहव-ए-हैरत है सुरय्या रिफ़अत-ए-परवाज़ परशाहिद-ए-मज़्मूँ तसद्दुक़ है तिरे अंदाज़ परख़ंदा-ज़न है ग़ुंचा-ए-दिल्ली गुल-ए-शीराज़ परआह तू उजड़ी हुई दिल्ली में आरामीदा हैगुलशन-ए-वीमर में तेरा हम-नवा ख़्वाबीदा हैलुत्फ़-ए-गोयाई में तेरी हम-सरी मुमकिन नहींहो तख़य्युल का न जब तक फ़िक्र-ए-कामिल हम-नशींहाए अब क्या हो गई हिन्दोस्ताँ की सर-ज़मींआह ऐ नज़्ज़ारा-आमोज़-ए-निगाह-ए-नुक्ता-बींगेसू-ए-उर्दू अभी मिन्नत-पज़ीर-ए-शाना हैशम्अ ये सौदाई-ए-दिल-सोज़ी-ए-परवाना हैऐ जहानाबाद ऐ गहवारा-ए-इल्म-ओ-हुनरहैं सरापा नाला-ए-ख़ामोश तेरे बाम दरज़र्रे ज़र्रे में तिरे ख़्वाबीदा हैं शम्स ओ क़मरयूँ तो पोशीदा हैं तेरी ख़ाक में लाखों गुहरदफ़्न तुझ में कोई फ़ख़्र-ए-रोज़गार ऐसा भी हैतुझ में पिन्हाँ कोई मोती आबदार ऐसा भी है
मैं सोई जो इक शब तो देखा ये ख़्वाबबढ़ा और जिस से मिरा इज़्तिराबये देखा कि मैं जा रही हूँ कहींअँधेरा है और राह मिलती नहींलरज़ता था डर से मिरा बाल बालक़दम का था दहशत से उठना मुहालजो कुछ हौसला पा के आगे बढ़ीतो देखा क़तार एक लड़कों की थीज़मुर्रद सी पोशाक पहने हुएदिए सब के हाथों में जलते हुएवो चुप-चाप थे आगे पीछे रवाँख़ुदा जाने जाना था उन को कहाँइसी सोच में थी कि मेरा पिसरमुझे इस जमाअत में आया नज़रवो पीछे था और तेज़ चलता न थादिया उस के हाथों में जलता न थाकहा मैं ने पहचान कर मेरी जाँमुझे छोड़ कर आ गए तुम कहाँजुदाई में रहती हूँ मैं बे-क़रारपिरोती हूँ हर रोज़ अश्कों के हारन पर्वा हमारी ज़रा तुम ने कीगए छोड़ अच्छी वफ़ा तुम ने कीजो बच्चे ने देखा मिरा पेच-ओ-ताबदिया उस ने मुँह फेर कर यूँ जवाबरुलाती है तुझ को जुदाई मिरीनहीं इस में कुछ भी भलाई मिरीये कह कर वो कुछ देर तक चुप रहादिया फिर दिखा कर ये कहने लगासमझती है तू हो गया क्या इसे?तिरे आँसुओं ने बुझाया इसे!
इक मौलवी साहब की सुनाता हूँ कहानीतेज़ी नहीं मंज़ूर तबीअत की दिखानीशोहरा था बहुत आप की सूफ़ी-मनुशी काकरते थे अदब उन का अआली ओ अदानीकहते थे कि पिन्हाँ है तसव्वुफ़ में शरीअतजिस तरह कि अल्फ़ाज़ में मुज़्मर हों मआनीलबरेज़ मय-ए-ज़ोहद से थी दिल की सुराहीथी तह में कहीं दुर्द-ए-ख़याल-ए-हमा-दानीकरते थे बयाँ आप करामात का अपनीमंज़ूर थी तादाद मुरीदों की बढ़ानीमुद्दत से रहा करते थे हम-साए में मेरेथी रिंद से ज़ाहिद की मुलाक़ात पुरानीहज़रत ने मिरे एक शनासा से ये पूछा'इक़बाल' कि है क़ुमरी-ए-शमशाद-ए-मआनीपाबंदी-ए-अहकाम-ए-शरीअत में है कैसागो शेर में है रश्क-ए-कलीम-ए-हमदानीसुनता हूँ कि काफ़िर नहीं हिन्दू को समझताहै ऐसा अक़ीदा असर-ए-फ़लसफ़ा-दानीहै उस की तबीअत में तशय्यो भी ज़रा सातफ़्ज़ील-ए-अली हम ने सुनी उस की ज़बानीसमझा है कि है राग इबादात में दाख़िलमक़्सूद है मज़हब की मगर ख़ाक उड़ानीकुछ आर उसे हुस्न-फ़रामोशों से नहीं हैआदत ये हमारे शोरा की है पुरानीगाना जो है शब को तो सहर को है तिलावतइस रम्ज़ के अब तक न खुले हम पे मआनीलेकिन ये सुना अपने मुरीदों से है मैं नेबे-दाग़ है मानिंद-ए-सहर उस की जवानीमज्मुआ-ए-अज़्दाद है 'इक़बाल' नहीं हैदिल दफ़्तर-ए-हिकमत है तबीअत ख़फ़क़ानीरिंदी से भी आगाह शरीअत से भी वाक़िफ़पूछो जो तसव्वुफ़ की तो मंसूर का सानीउस शख़्स की हम पर तो हक़ीक़त नहीं खुलतीहोगा ये किसी और ही इस्लाम का बानीअल-क़िस्सा बहुत तूल दिया वाज़ को अपनेता-देर रही आप की ये नग़्ज़-बयानीइस शहर में जो बात हो उड़ जाती है सब मेंमैं ने भी सुनी अपने अहिब्बा की ज़बानीइक दिन जो सर-ए-राह मिले हज़रत-ए-ज़ाहिदफिर छिड़ गई बातों में वही बात पुरानीफ़रमाया शिकायत वो मोहब्बत के सबब थीथा फ़र्ज़ मिरा राह शरीअत की दिखानीमैं ने ये कहा कोई गिला मुझ को नहीं हैये आप का हक़ था ज़े-रह-ए-क़ुर्ब-ए-मकानीख़म है सर-ए-तस्लीम मिरा आप के आगेपीरी है तवाज़ो के सबब मेरी जवानीगर आप को मालूम नहीं मेरी हक़ीक़तपैदा नहीं कुछ इस से क़ुसूर-ए-हमादानीमैं ख़ुद भी नहीं अपनी हक़ीक़त का शनासागहरा है मिरे बहर-ए-ख़यालात का पानीमुझ को भी तमन्ना है कि 'इक़बाल' को देखूँकी उस की जुदाई में बहुत अश्क-फ़िशानी'इक़बाल' भी 'इक़बाल' से आगाह नहीं हैकुछ इस में तमस्ख़ुर नहीं वल्लाह नहीं है
ये अक़्ल-ओ-फ़हम बड़ी चीज़ हैं मुझे तस्लीममगर लगा नहीं सकते हम इस का अंदाज़ाकि आदमी को ये पड़ती हैं किस क़दर महँगीइक एक कर के वो तिफ़्ली के हर ख़याल की मौतबुलूग़-ए-सिन में वो सदमे नए ख़यालों केनए ख़याल का धचका नए ख़याल की टीसनए तसव्वुरों का कर्ब, अल-अमाँ कि हयाततमाम ज़ख़्म निहाँ है तमाम नश्तर हैये चोट खा के सँभलना मुहाल होता है
देखे हैं इस से बढ़ के ज़माने ने इंक़लाबजिन से कि बे-गुनाहों की 'उम्रें हुईं ख़राबसोज़-ए-दरूँ से क़ल्ब ओ जिगर हो गए कबाबपीरी मिटी किसी की किसी का मिटा शबाबकुछ बन नहीं पड़ा जो नसीबे बिगड़ गएवो बिजलियाँ गिरीं कि भरे घर उजड़ गएमाँ बाप मुँह ही देखते थे जिन का हर घड़ीक़ाएम थीं जिन के दम से उमीदें बड़ी बड़ीदामन पे जिन के गर्द भी उड़ कर नहीं पड़ीमारी न जिन को ख़्वाब में भी फूल की छड़ीमहरूम जब वो गुल हुए रंग-ए-हयात सेउन को जला के ख़ाक किया अपने हात सेकहते थे लोग देख के माँ बाप का मलालइन बे-कसों की जान का बचना है अब मुहालहै किब्रिया की शान गुज़रते ही माह-ओ-सालख़ुद दिल से दर्द-ए-हिज्र का मिटता गया ख़यालहाँ कुछ दिनों तो नौहा-ओ-मातम हुआ कियाआख़िर को रो के बैठ रहे और क्या कियापड़ता है जिस ग़रीब पे रंज-ओ-मेहन का बारकरता है उस को सब्र 'अता आप किर्दगारमायूस हो के होते हैं इंसाँ गुनाहगारये जानते नहीं वो है दाना-ए-रोज़गारइंसान उस की राह में साबित-क़दम रहेगर्दन वही है अम्र-ए-रज़ा में जो ख़म रहेऔर आप को तो कुछ भी नहीं रंज का मक़ामबा'द-ए-सफ़र वतन में हम आएँगे शाद-कामहोते हैं बात करने में चौदह बरस तमामक़ाएम उमीद ही से है दुनिया है जिस का नाम
मुद्दतें बीत गईंतुम नहीं आईं अब तकरोज़ सूरज के बयाबाँ मेंभटकती है हयातचाँद के ग़ार मेंथक-हार के सो जाती है रातफूल कुछ देर महकता हैबिखर जाता हैहर नशालहर बनाने में उतर जाता हैवक़्त!बे-चेहरा हवाओं सा गुज़र जाता हैकिसी आवाज़ के सब्ज़े में लहक जैसी तुमकिसी ख़ामोश तबस्सुम में चमक जैसी तुमकिसी चेहरे में महकती हुई आँखों जैसीकहीं अबरू कहीं गेसू कहीं बाँहों जैसीचाँद सेफूल तलकयूँ तो तुम्हीं तुम हो मगरतुम कोई चेहरा कोई जिस्म कोई नाम नहींतुम जहाँ भी होअधूरी हो हक़ीक़त की तरहतुम कोई ख़्वाब नहीं होजो मुकम्मल होगी
तुझ से नज़र मिलाए ये किस की भला मजालतेरे क़दम का नक़्श हसीनों के ख़द्द-ओ-ख़ालअल्लाह रे तेरे हुस्न-ए-मलक-सोज़ का जलालजब देखती हैं ख़ुल्द से हूरें तिरा जमालपरतव से तेरे चेहरा-ए-पर्वीं-सरिश्त केघबरा के बंद करती हैं ग़ुर्फ़े बहिश्त के
यूँही देखूँ जो राखी को तो ये रंगीन डोरा हैजो देखूँ ग़ौर से इस को तो है ज़ंजीर लोहे कीजो बढ़ कर क़ैद कर लेती है आफ़त अपने भाई कीमुसीबत की हक़ीक़त क्यामुसीबत आ नहीं सकतीमुसीबत काँप जाती हैजो राखी देख लेती हैकिसी भाई के हाथ मेंराखी के धागे मेंबहन ने प्यार बाँधा हैइतिहास में राखी है रिश्ता भाई बहनों काहवाला इस में पोशीदा है सदियों के रिश्तों काबँधा है प्यार इस में बहन काऔर उस के पुरखों काराखीनिभाना लाज राखी की मिरे भय्याबहन का मान रख लेनाबँधा कर हाथ में राखी बहन सेहर कोई भाईबहन के सुख के वास्तेतय्यार हो जाता है मरने कोमगर भय्यातुम्हारी ज़िंदगी तोबहन को दिल से प्यारी हैसलामत तुम रहोभगवान से बिंती हमारी हैजो चाहो नेग तुम देनातो मुझ को ये वचन दे दोन उठे फिर कोई दीवार नफ़रत कीबहन भाई के आँगन मेंनहीं ब्योपार कुछ इस मेंये इक व्यवहार है भय्यानहीं है कच्चा ये डोरातिरा ए'तिबार है भय्या
मैं रंगों में हूँ कभी बरश मेंकभी कैनवस पे सजी हूँ मैंमैं क़ौस-ए-क़ुज़ह हूँ हुरूफ़ कीअल्फ़ाज़ की इक लड़ी हूँ मैंमुझे ख़ुद भी अपना पता नहींमैं कहाँ नहीं और कहाँ हूँ मैंअब तलाश करने से फ़ाएदामैं जो मिल भी जाऊँ तो क्या भलाफिर भी एक ख़लिश सी हैतेरी जुस्तुजू सुब्ह शाम हैये जो ख़्वाहिशें हैं फ़ुज़ूल सीइक 'उम्र से मिरे साथ हैंजो मैं दामन इन से छुड़ा सकूँतो सुकूँ तसव्वुफ़ में पा सकूँमगर शफ़्फ़ाफ़ पर्दे तसव्वुफ़ के हैंमुझे किस तरह से छुपाएँगेमुझे क़ैद करना मुहाल हैमैं मगन हूँ अपनी ही ज़ात मेंकौन-ओ-मकाँ से बे-ख़बरमुझे आरज़ू थी कभी मिलेकोई राज़-दाँ कोई हम-नवामगर कभी कोई ऐसा मिला नहींजहाँ रो सकूँ कभी रख के सरजो मिला वो अपना ही कांधा हैजहाँ रोती हूँ मैं झुका के सरमैं मुहीब रात का पहर हूँनहीं सहर मेरे नसीब मेंये सहर तेरी है तो रख इसेमैं तो सहर से बहुत दूर हूँमैं न हाथ अब कभी आऊँगीमुझे ढूँढना भी फ़ुज़ूल हैये जो रास्ते हैं चहार-सूले जाएँगे मुझे कू-ब-कूबहुत मंज़िलें हैं यहाँ वहाँमेरी मंज़िल इन मेंकोई नहींहाँ मेरी मंज़िल नहीं कोईमैं तो अपनी मंज़िल आप हूँ
इक मंज़िल के लिएकितनी मंज़िलें तय करता हैइंसान यहाँदो ढाई गज़ ज़मीं के लिएकितनी मुश्किलें सर करता हैइंसान यहाँअज़ान से नमाज़ तक का फ़क़त इक सफ़र हैबाक़ी सफ़र यूँही बेकार तय करता हैइंसान यहाँ
तितली जुगनू रंग-ओ-ख़ुशबूगुल-ओ-बुलबुल जैसेइस्ति'आरे नहीं हैं पास मिरेक्यूँके मैं नेसिसकती सुलगती तड़पती हुईज़िंदगी को देखा हैखुली आँख सेमैं ने देखी हैलहू से तर सड़केंमैं ने देखे हैं जनरल वॉर्ड मेंबेबसी से एड़ियाँ रगड़ते हुएबच्चे बूढ़े लाचारमैं ने देखी हैंरोटी के बदलेरिदा होती हुईतार-तारमिरे शु'ऊर मेंआज भी ताज़ा है'सारा-शगुफ़्ता’ के बिना कफ़न केफूल जैसे बच्चे की लाशमैं ने देखी हैमस्जिद की टूटती हुई मेहराबअब मिरी बे-नूर आँखेंकैसे देखे कोई हसीन ख़्वाब
क़द्र ऐ दिल वतन में रहने कीपूछे परदेसियों के जी से कोईजब मिला राम-चंद्र को बन-बासऔर निकला वतन से हो के उदासबाप का हुक्म रख लिया सर परपर चला साथ ले के दाग़-ए-जिगरपाँव उठता था उस का बन की तरफ़और खिंचता था दिल वतन की तरफ़गुज़रे ग़ुर्बत में इस क़दर मह-ओ-सालपर न भोला अयोध्या का ख़यालदेस को बन में जी भटकता रहादिल में काँटा सा इक खटकता रहातीर इक दिल में आ के लगता थाआती थी जब अयोध्या की हवाकटने चौदह बरस हुए थे मुहालगोया एक एक जुग था एक इक साल
ख़ुलूस के ऐसे दिए जलाएँबुझा सके न जिन को मुख़ालिफ़ हवाएँसदा गूँजे मंदिर की घंटियाँबराबर अज़ानें भी आएँसारी नफ़रतें बह जाएँगंगा घाट पर अगर मन भी नहलाएँनफ़रत कुदूरत से दिल साफ़ हो तोहाथों के साथ दिल भी मिलाएँगवाह बना के गंगा की लहरों कोसच्ची चाहत का वा'दा करेंऔर फिर वो वा'दे निभाएँजुस्तुजू है अब मोहब्बत की उल्फ़त की सब कोदिल की बातें सब को बताएँ
वो एक तर्ज़-ए-सुख़न की ख़ुश्बूवो एक महका हुआ तकल्लुमलबों से जैसे गुलों की बारिशकि जैसे झरना सा गिर रहा होकि जैसे ख़ुश्बू बिखर रही होकि जैसे रेशम उलझ रहा होअजब बलाग़त थी गुफ़्तुगू मेंरवाँ था दरिया फ़साहतों कावो एक मकतब था आगही कावो इल्म-ओ-दानिश का मय-कदा थावो क़ल्ब और ज़ेहन का तसादुमजो गुफ़्तुगू में रवाँ-दवाँ थावो उस के अल्फ़ाज़ की रवानीवो उस का रुक रुक के बात करनावो शो'ला-ए-लफ़्ज़ और मआ'नीकहीं लपकना कहीं ठहरनाठहर के फिर वो कलाम करनाबहुत से जज़्बों की पर्दा-दारीबहुत से जज़्बों को आम करनाजो मैं ने पूछागुज़िश्ता शब के मुशाएरे में बहुत से शैदाई मुंतज़िर थेमुझे भी ये ही पता चला था कि आप तशरीफ़ ला रहे हैंमगर हुआ क्याज़रा तवक़्क़ुफ़ के बा'द बोले नहीं गया मैंन जा सका मैंसुनो हुआ क्यामैं ख़ुद को माइल ही कर न पायाये मेरी हालत मेरी तबीअ'तफिर उस पे मेरी ये बद-मिज़ाजी-ओ-बद-हवासीये वहशत-ए-दिलमियाँ हक़ीक़त है ये भी सुन लो कि अब हमारे मुशाएरे भीनहीं हैं उन वहशतों के हामिलजो मेरी तक़दीर बन चुकी हैंजो मेरी तस्वीर बन चुकी हैंजो मेरी तक़्सीर बन चुकी हैंफिर इक तवक़्क़ुफ़कि जिस तवक़्क़ुफ़ की कैफ़ियत पर गराँ समाअ'त गुज़र रही थीउस एक साअ'त का हाथ थामे ये इक वज़ाहत गुज़र रही थीअदब-फ़रोशों ने जाहिलों ने मुशाएरे को भी इक तमाशा बना दिया हैग़ज़ल की तक़्दीस लूट ली है अदब को मुजरा बना दिया हैसुख़न-वरों ने भी जाने क्या क्या हमारे हिस्से में रख दिया हैसितम तो ये है कि चीख़ को भी सुख़न के ज़ुमरे में रख दिया हैइलाही तौबासमाअ'तों में ख़राशें आने लगी हैं अब और शिगाफ़ ज़ेहनों में पड़ गए हैंमियाँ हमारे क़दम तो कब के ज़मीं में ख़िफ़्फ़त से गड़ गए हैंख़मोशियों के दबीज़ कोहरे से चंद लम्हों का फिर गुज़रनावो जैसे ख़ुद को उदासियों के समुंदरों में तलाश करनावो जैसे फिर सुरमई उफ़ुक़ पर सितारे अल्फ़ाज़ के उभरनाये ज़िंदगी से जो बे-नियाज़ी है किस लिए हैये रोज़-ओ-शब की जो बद-हवासी है किस लिए हैबस इतना समझोकि ख़ुद को बरबाद कर चुका हूँसुख़न तो आबाद ख़ैर क्या होमगर जहाँ दिल धड़क रहे हों वो शहर आबाद कर चुका हूँबचा ही क्या हैथा जिस के आने का ख़ौफ़ मुझ को वो एक साअ'त गुज़र चुकी हैवो एक सफ़हा कि जिस पे लिक्खा था ज़िंदगी को वो खो चुका हैकिताब-ए-हस्ती बिखर चुकी हैपढ़ा था मैं ने भी ज़िंदगी कोमगर तसलसुल नहीं था उस मेंइधर-उधर से यहाँ वहाँ से अजब कहानी गढ़ी गई थीसमझ में आई न इस लिए भी के दरमियाँ से पढ़ी गई थीसमझता कैसेन फ़लसफ़ी मैं न कोई आलिमउक़ूबतों के सफ़र पे निकला मैं इक सितारा हूँ आगही काअजल के हाथों में हाथ डाले इक इस्तिआ'रा हूँ ज़िंदगी काइ'ताब नाज़िल हुआ है जिस पर मैं वो ही मा'तूब आदमी हूँसितमगरों को तलब है जिस की मैं वो ही मतलूब आदमी हूँकभी मोहब्बत ने ये कहा था मैं एक महबूब आदमी हूँमगर वो ज़र्ब-ए-जफ़ा पड़ी है कि एक मज़रूब आदमी हूँमैं एक बेकल सा आदमी हूँ बहुत ही बोझल सा आदमी हूँसमझ रही है ये दुनिया मुझ को मैं एक पागल सा आदमी हूँमगर ये पागल ये नीम-वहशी ख़िरद के मारों से मुख़्तलिफ़ हैजो कहना चाहा था कह न पायाकहा गया जो उसे ये दुनिया समझ न पाईन बात अब तक कही गई हैन बात अब तक सुनी गई हैशराब-ओ-शेर-ओ-शुऊ'र का जो इक तअ'ल्लुक़ है उस के बारे में राय क्या हैसुना है हम ने कि आप पर भी बहुत से फ़तवे लगे हैं लेकिनशराब-नोशी हराम है तोये मसअला भी बड़ा अजब हैमैं एक मय-कश हूँ ये तो सच हैमगर ये मय-कश कभी किसी के लहू से सैराब कब हुआ हैहमेशा आँसू पिए हैं उस ने हमेशा अपना लहू पिया हैये बहस छोड़ो हराम क्या है हलाल क्या है अज़ाब क्या है सवाब क्या हैशराब क्या हैअज़िय्यतों से नजात है ये हयात है येशराब-ओ-शब और शाइ'री ने बड़ा सहारा दिया है मुझ कोसँभाल रक्खा शराब ने और रही है मोहसिन ये रात मेरीइसी ने मुझ को दिए दिलासे सुनी है इस ने ही बात मेरीहमेशा मेरे ही साथ जागी हमेशा मेरे ही साथ सोईमैं ख़ुश हुआ तो ये मुस्कुराई मैं रो दिया तो ये साथ रोईये शेर-गोई है ख़ुद-कलामी का इक ज़रीयाइसी ज़रीये इसी वसीले से मैं ने ख़ुद से वो बातें की हैंजो दूसरों से मैं कह न पायाहराम क्या है हलाल क्या है ये सब तमाशे हैं मुफ़्तियों केये सारे फ़ित्ने हैं मौलवी केहराम कर दी थी ख़ुद-कुशी भी कि अपनी मर्ज़ी से मर न पाएये मय-कशी भी हराम ठहरी कि हम को अपना लहू भी पीने का हक़ नहीं हैकि अपनी मर्ज़ी से हम को जीने का हक़ नहीं हैकिसे बताएँज़मीर-ओ-ज़र्फ-ए-बशर पे मौक़ूफ़ हैं मसाइलसमुंदरों में उंडेल जितनी शराब चाहेन हर्फ़ पानी पे आएगा और न उस की तक़्दीस ख़त्म होगीतो मय-कशी को हराम कहने से पहले देखोकि पीने वाले का ज़र्फ़ क्या है हैं किस के हाथों में जाम-ओ-मीनाये नुक्ता-संजी ये नुक्ता-दानी जो मौलवी की समझ में आती तो बात बनतीन दीन-ओ-मज़हब को जिस ने समझा न जिस ने समझा है ज़िंदगी कोतहूरा पीने की बात कर के हराम कहता है मय-कशी कोजो दीन-ओ-मज़हब का ज़िक्र आया तो मैं ने पूछाकि इस हवाले से राय क्या हैये ख़ुद-परस्ती ख़ुदा-परस्ती के दरमियाँ का जो फ़ासला हैजो इक ख़ला है ये क्या बला हैये दीन-ओ-मज़हब फ़क़त किताबेंब-जुज़ किताबों के और क्या हैकिताबें ऐसी जिन्हें समझने की कोशिशें कम हैं और ज़ियादा पढ़ा गया हैकिताबें ऐसी कि आम इंसाँ को इन के पढ़ने का हक़ है लेकिनइन्हें समझने का हक़ न हरगिज़ दिया गया हैकि इन किताबों पे दीन-ओ-मज़हब के ठेकेदार इजारा-दारों की दस्तरस हैइसी लिए तो ये दीन-ओ-मज़हब फ़साद-ओ-फ़ित्ना बने हुए हैंये दीन-ओ-मज़हबजो इल्म-ओ-हिकमत के साथ हो तो सुकून होगाजो दस्तरस में हो जाहिलों की जुनून होगाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये ज़िंदगी का जवाज़ क्या हैये तुम हो जी जी के मर रहे हो ये मैं हूँ मर मर के जी रहा हूँये राज़ क्या हैहै क्या हक़ीक़त मजाज़ क्या हैसिवाए ख़्वाबों के कुछ नहीं हैब-जुज़ सराबों के कुछ नहीं हैये इक सफ़र है तबाहियों का उदासियों की ये रहगुज़र हैन इस को दुनिया का इल्म कोई न इस को अपनी कोई ख़बर हैकभी कहीं पर नज़र न आए कभी हर इक शय में जल्वा-गर हैकभी ज़ियाँ है कभी ज़रर हैन ख़ौफ़ इस को न कुछ ख़तर हैकभी ख़ुदा है कभी बशर हैहुआ हक़ीक़त से आश्ना तो ये सू-ए-दार-ओ-रसन गया हैकभी हँसा है ये ज़ेर-ए-ख़ंजर कभी ये सूली पे हँस दिया हैकभी ये गुलनार हो गया है सिनाँ पे गुफ़्तार हो गया हैकभी हुआ है ये ग़र्क़-ए-दरियाकभी ये तक़्दीर-ए-दश्त-ओ-सेहरारक़म हुआ है ये आंसुओं मेंकभी लहू ने है इस को लिक्खाहिकायत-ए-दिल हिकायत-ए-जाँ हिकायत-ए-ज़िन्दगी यही हैअगर सलीक़े से लिक्खी जाए इबारत-ए-ज़िन्दगी यही हैये हुस्न है उस धनक की सूरतकि जिस के रंगों का फ़ल्सफ़ा ही कभी किसी पर नहीं खुला हैये फ़ल्सफ़ा जो फ़रेब-ए-पैहम का सिलसिला हैकि इस के रंगों में इक इशारा है बे-रुख़ी काइक इस्तिआ'रा है ज़िंदगी काकभी अलामत है शोख़ियों कीकभी किनाया है सादगी काबदलते मौसम की कैफ़ियत के हैं रंग पिन्हाँ इसी धनक मेंकशिश शरारत-ओ-जाज़बिय्यत के शोख़ रंगों ने इस धनक को अजीब पैकर अता किया है इक ऐसा मंज़र अता किया हैकि जिस के सेहर-ओ-असर में आ करलहू बहुत आँखें रो चुकी हैं बहुत तो बीनाई खो चुकी हैंबसारतें क्या बसीरतें भी तो अक़्ल-ओ-दानाई खो चुकी हैंन जाने कितने ही रंग मख़्फ़ी हैं इस धनक मेंबस एक रंग-ए-वफ़ा नहीं हैंइस एक रंगत की आरज़ू ने लहू रुलाया है आदमी कोयही बताया है आगही कोये इक छलावा है ज़िंदगी काहसीन धोका है ज़िंदगी कामगर मुक़द्दर है आदमी काफ़रेब-ए-गंदुम समझ में आया तो मैं ने जानाये इश्क़ क्या है ये हुस्न क्या हैये एक लग़्ज़िश है जिस के दम से हयात-ए-नौ का भरम खुला है
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