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नज़्म
हर आन नफ़अ' और टोटे में क्यूँ मरता फिरता है बन बन
टक ग़ाफ़िल दिल में सोच ज़रा है साथ लगा तेरे दुश्मन
नज़ीर अकबराबादी
नज़्म
मौज-ए-मुज़्तर थी कहीं गहराइयों में मस्त-ए-ख़्वाब
रात के अफ़्सूँ से ताइर आशियानों में असीर
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
तेरी निगाह-ए-नाज़ से दोनों मुराद पा गए
अक़्ल, ग़याब ओ जुस्तुजू! इश्क़, हुज़ूर ओ इज़्तिराब!
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
ख़ाक-ए-मरक़द पर तिरी ले कर ये फ़रियाद आऊँगा
अब दुआ-ए-नीम-शब में किस को मैं याद आऊँगा
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
मैं भी नाकाम-ए-वफ़ा था तो भी महरूम-ए-मुराद
हम ये समझे थे कि दर्द-ए-मुश्तरक रास आ गया