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नज़्म
लोग अटकाते हैं क्यूँ रोड़े हमारे काम में
जिस को देखो ख़ैर से नंगा है वो हम्माम में
जोश मलीहाबादी
नज़्म
क्या पैरों की थकन इस सफ़र को रोक सकती है
क्या रास्ते के रोड़े मेरे इरादे को तोड़ सकते हैं
ख़लील मामून
नज़्म
तफ़रीह के सारे कामों में जब रोड़े सब अटकाते थे
जब खेल का नाम आ जाता था बल तेवरी पर पड़ जाते थे
सय्यदा फ़रहत
नज़्म
मैं जब औसान अपने खोने लगता हूँ तो हँसता हूँ
मैं तुम को याद कर के रोने लगता हूँ तो हँसता हूँ
जौन एलिया
नज़्म
अख़्तर शीरानी
नज़्म
ज़ालिम को जो न रोके वो शामिल है ज़ुल्म में
क़ातिल को जो न टोके वो क़ातिल के साथ है
साहिर लुधियानवी
नज़्म
मश्रिक-ओ-मग़रिब की क़ौमों के लिए रोज़-ए-हिसाब
इस से बढ़ कर और क्या होगा तबीअ'त का फ़साद
अल्लामा इक़बाल
नज़्म
कलमा भी पढ़ते जाते हैं रोते हैं ज़ार-ज़ार
सब आदमी ही करते हैं मुर्दे के कारोबार