गिलगित ख़ान

सआदत हसन मंटो

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    स्टोरीलाइन

    यह होटल में काम करने वाले एक बहुत बदसूरत नौकर की कहानी है। उसकी बदसूरती के कारण उसका मालिक उसे पसंद करता है और न ही वहाँ आने वाले ग्राहक। मगर अपनी मेहनत और शिष्टाचार से वह सभी का लोकप्रिय बन जाता है। अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए वह मालिक की नापसंदगी के बावजूद एक कुत्ते का पिल्ला पाल लेता है। बड़ा होने पर कुत्ते को पेट की कोई बीमारी हो जाती है, तो उसे ठीक करने के लिए गिलगित ख़ान चोरी से अपने मालिक का बटेर मारकर कुत्ते को खिला देता है।

    शहबाज़ ख़ान ने एक दिन अपने मुलाज़िम जहांगीर को जो उसके होटल में अंदर-बाहर का काम करता था उसकी सुस्त-रवी से तंग आकर बरतरफ़ कर दिया। असल में वो सुस्त-रौ नहीं था। इस क़दर तेज़ था कि उसकी हर हरकत शहबाज़ ख़ान को ग़ैर मुतहर्रिक मालूम होती थी।

    शहबाज़ ख़ान ने उसको महीने की तनख़्वाह दी। जहांगीर ने उसको सलाम किया और टिकट कटा कर सीधा बलोचिस्तान चला गया जहां कोयले की कांनें निकल रही थीं। उसके और कई दोस्त वहीं चले गए थे। लेकिन उसने गिलगित अपने भाई हमज़ा ख़ान को ख़त लिखा कि वो शहबाज़ ख़ान के यहां मुलाज़मत कर ले क्योंकि उसे अपना ये आक़ा पसंद था।

    एक दिन हमज़ा ख़ान, शहबाज़ ख़ान के होटल में आया और एक कार्ड दिखा कर उसने कहा, खू अम मुलाज़मत चाहता है... अमारे भाई ने लिखा है, तुम अच्छा और नेक आदमी है... खू अम भी अच्छा और नेक है... तुम कितना पैसा देगा?”

    शहबाज़ ख़ान ने हमज़ा ख़ान की तरफ़ देखा। वो जहांगीर का भाई किसी लिहाज़ से भी दिखाई नहीं देता था। नाटा सा क़द, नाक चौड़ी चपटी। निहायत बदशक्ल। शहबाज़ ख़ान ने उसे एक नज़र देख कर और जहांगीर का ख़त पढ़ कर सोचा कि इसको निकाल बाहर करे। मगर आदमी नेक था, उसने किसी साइल को ख़ाली नहीं जाने दिया था।

    हमज़ा ख़ान को चुनांचे उसने पंद्रह रुपये माहवार पर मुलाज़िम रख लिया और ये हिदायत कर दी कि जो काम उसके सपुर्द किया जाये ईमानदारी से करे।

    हमज़ा ख़ान ने अपने बदनुमा होंटों से मुस्कुराहट पैदा करते हुए शहबाज़ ख़ान को यक़ीन दिलाया, “ख़ान बादशाह... अम तुमको कभी तंग नहीं करेगा, जो कहेगा मानेगा।”

    शहबाज़ ख़ान ये सुन कर ख़ुश होगया।

    हमज़ा ख़ान ने शुरू शुरू में कुछ इतना अच्छा काम किया लेकिन थोड़े अर्से में वो सब कुछ सीख गया। चाय कैसे बनाई जाती है। शक्कर के साथ गुड़ कितना डाला जाता है। कोयले वालियों से कोयले कैसे हासिल किए जाते हैं और मुख़्तलिफ़ ग्राहकों के साथ किस क़िस्म का सुलूक रवा रखना चाहिए... ये उसने सीख लिया।

    उसमें सिर्फ़ एक कमी थी कि वो बेहद बदशक्ल था। बदतमीज़ भी किसी हद तक था... इसलिए कि उसकी शक्ल-सूरत देखकर शहबाज़ ख़ान के होटल में आने-जाने वाले कुछ घबरा से जाते।

    मगर जब गाहक आहिस्ता-आहिस्ता उसकी बदसूरती से मानूस होगए तो उन्होंने उसके बारे में सोचना छोड़ दिया। बल्कि बा'ज़ लोग तो उससे दिलचस्पी लेने लगे इसलिए कि वो काफ़ी दिलचस्प चीज़ था। मगर इस दिलचस्पी से हमज़ा ख़ान को तस्कीन नहीं होती थी। वो ये समझता था कि महज़ हंसी-मज़ाक़ की ख़ातिर ये लोग जो होटल में चंद घंटे गुज़ारने आते हैं उससे दिलचस्पी का इज़हार करते हैं।

    यूं हमज़ा ख़ान गिलगित ख़ान के नाम से मशहूर होगया था इसलिए कि वो काफ़ी देर गिलगित में रहा था और उस रियासत का ज़िक्र बार बार किया करता था। इसलिए होटल में आने जाने वालों ने उसका नाम गिलगित ख़ान रख दिया, जिस पर हमज़ा ख़ान को एतराज़ नहीं था। हमज़ा के क्या मानी होते हैं, उसको मालूम नहीं था बल्कि गिलगित का मतलब वो बख़ूबी समझता था।

    शहबाज़ ख़ान के होटल में आए उसको क़रीब-क़रीब एक बरस होगया। इस दौरान में उसने महसूस किया कि उसका मालिक शहबाज़ ख़ान उसकी शक्ल-सूरत से मुतनफ़्फ़िर है, ये एहसास उसे खाए जाता था।

    एक दिन उसने होटल के बाहर कुत्ते का पिल्ला देखा जो उससे भी कहीं ज़्यादा बदसूरत था। उसको उठा कर वो अपनी कोठरी में ले आया जो उसे होटल की बालाई मंज़िल पर रहने सहने के लिए दी गई थी। ये इतनी छोटी थी कि अगर कुत्ते का एक और पिल्ला जाता तो वो उसमें गिलगित ख़ान के साथ समा सकता।

    इस कुत्ते के पल्ले की टांगें टेढ़ी-मेढ़ी थीं... थूथनी बड़ी वाहियात थी। अजीब बात है कि गिलगित ख़ान की टांगें... बल्कि यूं कहिए कि उसका निचला धड़ उसके ऊपर के जिस्मानी हिस्से के मुक़ाबले में बहुत छोटा था। बिल्कुल उसके मानिंद ये पिल्ला भी मस्ख़शुदा सूरत का था।

    गिलगित ख़ान उससे बहुत प्यार करता। शहबाज़ ख़ान ने उससे कई मर्तबा कहा कि मैं इस कुत्ते के बच्चे को गोली मार दूँगा। मगर गिलगित ख़ान उसको किसी भी हालत में अपने से जुदा करने पर राज़ी नहीं था। उसने शुरू शुरू में तो अपने आक़ा से कुछ कहा। ख़ामोशी से उसकी बातें सुनता रहा। आख़िर एक रोज़ उससे साफ़ लफ़्ज़ों में उसने कह दिया, “ख़ू, तुम... होटल के मालिक हो। मेरे दोस्त टुनटुन के मालिक नहीं हो।”

    शहबाज़ ख़ान ये सुन कर चुप होगया। गिलगित ख़ान बड़ा मेहनती था। सुबह पाँच बजे उठता दो अंगीठियां सुलगाता सामने वाले नल से पानी भरता और फिर ग्राहकों की ख़िदमत में मसरूफ़ हो जाता।

    उसका टुनटुन महीनों बाद बड़ा होगया। वो उसके साथ कोठरी में सोता था जो होटल की बालाई मंज़िल पर थी... सर्दियां थीं। इसलिए गिलगित ख़ान को अपने बिस्तर में उसकी मौजूदगी बुरी नहीं मालूम होती थी बल्कि वो ख़ुश था कि वो उससे इस क़दर प्यार करता है कि रात को भी उसका साथ नहीं छोड़ता।

    टुनटुन नाम गिलगित ख़ान के एक ख़ास गाहक ने रखा था, जो उसकी इंतिहाई बदसूरती के बावजूद उससे दिलचस्पी लेता। ये नाम इसलिए रखा गया कि कुत्ते का वो पिल्ला जिसे वो सड़क पर से उठा कर अपने पास ले आया था और जिसकी गर्दन में उसने अपनी तनख़्वाह में से पैसे बचा कर एक ऐसा पट्टा डाला था जिसमें घुंघरु बंधे हुए थे। उस ख़ास गाहक ने जो ग़ालिबन किसी रोज़नामे का कालम नवीस था, उन घुंघरुओं की आवाज़ सुन कर उसका नाम टुनटुन रख दिया।

    टुनटुन जब बड़ा हुआ तो उसकी टांगें और भी ज़्यादा छोटी होगईं। गिलगित ख़ान की भी यही हालत थी। उसकी टांगें भी दिन-ब-दिन मुख़्तसर हो रही थीं। ऊपर का धड़ मुनासिब-ओ-मौज़ूं अंदाज़ में बढ़ गया था।

    शहबाज़ ख़ान को गिलगित ख़ान का ये हुलिया पसंद नहीं था मगर वो मेहनती था। गधे की मानिंद काम करता। सुबह पाँच बजे से लेकर रात के ग्यारह बारह बजे तक होटल में रहता। एक घड़ी के लिए भी आराम करता। लेकिन इस दौरान में वो तीन-चार मर्तबा ऊपर अपनी कोठड़ी में ज़रूर जाता और अपने प्यारे कुत्ते की जो अब बड़ा होगया था, देख-भाल करता था। उसको होटल का बचा खुचा खाना देता, पानी पिलाता और प्यार कर के फ़ौरन वापस चला आता।

    एक दिन उसका टुनटुन बीमार होगया। होटल में अक्सर मेडिकल स्टुडेंट आया करते थे क्योंकि उनका कॉलिज नज़दीक ही था। गिलगित ख़ान ने उनमें से एक को ये कहते हुए सुना कि अगर पेट की शिकायत हो तो मरीज़ को बटेर या मुर्ग़ का गोश्त खिलाना चाहिए। फ़ाक़ा देना सख़्त हिमाक़त है।

    उसने अपने टुनटुन को सुबह से कोई चीज़ खाने को नहीं दी थी। इसलिए कि उसको बदहज़मी थी। मगर जब उसने इस मेडिकल स्टूडेंट्स की बात सुनी तो उसने इधर-उधर कोई मुर्ग़ तलाश करना शुरू किया मगर मिला। मुहल्ला ही कुछ ऐसा था जिसमें कोई मुर्ग़-मुर्ग़ियां नहीं पालता था।

    शहबाज़ ख़ान को बटेर बाज़ी का शौक़ था। उसके पास एक बटेर था जिसे वो अपनी जान से ज़्यादा अज़ीज़ समझता था। गिलगित ख़ान ने तिनकों का बना हुआ पिंजरा खोला और हाथ डाल कर ये बटेर पकड़ी। कल्मा पढ़ कर उसको ज़बह किया और अपने टुनटुन को खिला दिया।

    शहबाज़ ख़ान ने जब पिंजरा ख़ाली देखा तो बहुत परेशान हुआ। उसकी समझ में आया कि बटेर इसमें से कैसे उड़ गई। वो तो उसके इशारों पर चलती थी। कई पालियां उसने बड़ी शान से जीती थीं। उसने गिलगित ख़ान से पूछा तो उसने कहा, “ख़ू मुझे क्या मालूम... तुम्हारा बटेर किधर गया... भाग गया होगा किधर।”

    शहबाज़ ख़ान ने जब ज़्यादा जुस्तजू की तो उसने देखा कि उसके होटल के सामने जहां बदरु थी थोड़ा सा ख़ून और बचे हुए पर पड़े हैं। ये बिलाशुबहा उसकी बटेर के थे, वो सर पीट कर रह गया, उसने सोचा कोई ज़ालिम उसको भून कर खा गया है।

    बटेर के पर उसके जाने-पहचाने थे। उसने उनको बड़े प्यार से इकट्ठा किया और अपने होटल के पिछवाड़े जहां खुला मैदान था, छोटा सा गढ़ा खोद कर उन्हें दफ़न कर दिया, फ़ातिहा पढ़ी। इसके बाद उसने कई ग़रीबों को अपने होटल से मुफ़्त खाना भी खिलाया ताकि मरहूम की रूह को सवाब पहुंचे।

    जब शहबाज़ ख़ान से कोई उसकी बटेर के मुतअल्लिक़ पूछता तो वो कहता, “शहीद होगया है।”

    गिलगित ख़ान ये सुनता और अपने कान समेटे ख़ामोश काम में मशग़ूल रहता।

    उसका टुनटुन अच्छा होगया। उसको जो शिकायत थी रफ़ा होगई। गिलगित ख़ान बहुत ख़ुश था। उसने अपने प्यारे कुत्ते की सेहतयाबी पर दो भिकारियों को होटल से खाना खिलाया। शहबाज़ ख़ान ने पूछा कि तुमने उनसे दाम वसूल क्यों नहीं किए तो उस ने कहा, “कभी कभी ख़ैरात भी दे देना चाहिए ख़ान... यह सुनकर शाहबाज़ ख़ान चुप हो गया।

    स्रोत :
    • पुस्तक : باقیات منٹو

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