इश्क़ में मीर साहब

मीर को उर्दू का ख़ुदा-ए-सुख़न कहा जाता है और बजा कहा जाता है। ये मुन्तख़ब अशआर पढ़िए और मीर को एक आशिक़ के तौर पर देखने का लुत्फ़ लीजिए।

आग थे इब्तिदा-ए-इश्क़ में हम

अब जो हैं ख़ाक इंतिहा है ये

मीर तक़ी मीर

हम हुए तुम हुए कि 'मीर' हुए

उस की ज़ुल्फ़ों के सब असीर हुए

मीर तक़ी मीर

इश्क़ इक 'मीर' भारी पत्थर है

कब ये तुझ ना-तवाँ से उठता है

मीर तक़ी मीर

फूल गुल शम्स क़मर सारे ही थे

पर हमें उन में तुम्हीं भाए बहुत

मीर तक़ी मीर

ज़ख़्म झेले दाग़ भी खाए बहुत

दिल लगा कर हम तो पछताए बहुत

मीर तक़ी मीर

मिरे सलीक़े से मेरी निभी मोहब्बत में

तमाम उम्र मैं नाकामियों से काम लिया

मीर तक़ी मीर

फिरते हैं 'मीर' ख़्वार कोई पूछता नहीं

इस आशिक़ी में इज़्ज़त-ए-सादात भी गई

मीर तक़ी मीर

इश्क़ करते हैं उस परी-रू से

'मीर' साहब भी क्या दिवाने हैं

मीर तक़ी मीर

हम ने अपनी सी की बहुत लेकिन

मरज़-ए-इश्क़ का इलाज नहीं

मीर तक़ी मीर

कासा-ए-चश्म ले के जूँ नर्गिस

हम ने दीदार की गदाई की

मीर तक़ी मीर

लगा दिल को कहीं क्या सुना नहीं तू ने

जो कुछ कि 'मीर' का इस आशिक़ी ने हाल किया

मीर तक़ी मीर

'मीर'-जी ज़र्द होते जाते हो

क्या कहीं तुम ने भी किया है इश्क़

मीर तक़ी मीर

मसाइब और थे पर दिल का जाना

अजब इक सानेहा सा हो गया है

मीर तक़ी मीर

लेते ही नाम उस का सोते से चौंक उठ्ठे

है ख़ैर 'मीर'-साहिब कुछ तुम ने ख़्वाब देखा

मीर तक़ी मीर

इश्क़ का घर है 'मीर' से आबाद

ऐसे फिर ख़ानमाँ-ख़राब कहाँ

मीर तक़ी मीर

हम तौर-ए-इश्क़ से तो वाक़िफ़ नहीं हैं लेकिन

सीने में जैसे कोई दिल को मला करे है

मीर तक़ी मीर

ज़ेर-ए-शमशीर-ए-सितम 'मीर' तड़पना कैसा

सर भी तस्लीम-ए-मोहब्बत में हिलाया गया

मीर तक़ी मीर

समझे थे हम तो मीर को आशिक़ उसी घड़ी

जब सुन के तेरा नाम वो बेताब सा हुआ

मीर तक़ी मीर

आलम आलम इश्क़-ओ-जुनूँ है दुनिया दुनिया तोहमत है

दरिया दरिया रोता हूँ मैं सहरा सहरा वहशत है

मीर तक़ी मीर

रहा था देख ऊधर 'मीर' चलते

अजब इक ना-उमीदी थी नज़र में

मीर तक़ी मीर

कहना था किसू से कुछ तकता था किसू का मुँह

कल 'मीर' खड़ा था याँ सच है कि दिवाना था

मीर तक़ी मीर

जैसे बिजली के चमकने से किसू की सुध जाए

बे-ख़ुदी आई अचानक तिरे जाने से

मीर तक़ी मीर

क्या जानिए कि इश्क़ में ख़ूँ हो गया कि दाग़

छाती में अब तो दिल की जगह एक दर्द है

मीर तक़ी मीर

गर उस के ओर कोई गर्मी से देखता है

इक आग लग उठे है अपने तो तन बदन में

मीर तक़ी मीर

कुछ देखा फिर ब-जुज़ यक शोला-ए-पुर-पेच-ओ-ताब

शम्अ' तक तो हम ने देखा था कि परवाना गया

मीर तक़ी मीर

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