संपूर्ण
परिचय
ई-पुस्तक1349
लेख40
उद्धरण30
तंज़-ओ-मज़ाह1
शेर35
ग़ज़ल31
नज़्म6
ऑडियो 11
वीडियो2
चित्र शायरी 6
आल-ए-अहमद सुरूर के लेख
ग़ज़ल का फ़न
ग़ज़ल के सिलसिले में पहले अपने दो शेर पढ़ने की इजाज़त चाहता हूँ, ग़ज़ल में ज़ात भी है और कायनात भी है हमारी बात भी है और तुम्हारी बात भी है सुरूर इसके इशारे दास्तानों पर भी भारी हैं ग़ज़ल में जौहर-ए-अरबाब-ए-फ़न की आज़माइश है यानी ग़ज़ल में निजी अनुभवों
तन्क़ीद क्या है?
पश्चिम के असर से उर्दू में कई सुखद इज़ाफ़े हुए, इनमें सबसे अहम तनक़ीद (आलोचना) की कला है। इसका यह मतलब नहीं कि पश्चिम के असर से पहले उर्दू साहित्य में कोई तनक़ीदी चेतना नहीं रखता था, या शेरो-अदब के बारे में बातचीत, शायरों पर टिप्पणी और भाषा व शैली की
अदब में जदीदियत का मफ़हूम
जदीदियत (आधुनिकता) की एक ऐतिहासिक धारणा है, एक दार्शनिक धारणा है और एक साहित्यिक धारणा है। मगर जदीदियत एक सापेक्ष (relative) चीज़ है, यह पूर्ण या निरपेक्ष नहीं है। अतीत में ऐसे लोग हुए हैं जो आज भी जदीद (आधुनिक) मालूम होते हैं। आज भी ऐसे लोग हैं जो असल
शायरी और नस्र का फ़र्क़
शैलीविज्ञान (stylistics) और संरचनावाद (structuralism) के विशेषज्ञों का कहना यह है कि NORM या मानक गद्य है और शायरी दरअसल इस मानक में ठहराव (PAUSE) या विचलन (DEVIATION) का नाम है। इन लोगों ने यूरोप की क्लासिकी शायरी, रूमानी शायरी और आधुनिक शायरी के अध्ययन
फ़िक्शन क्या? क्यों? और कैसे?
डी. एच. लॉरेंस कहता है, "मैं ज़िंदा इंसान हूँ और जब तक मेरे बस में है मेरा इरादा ज़िंदा इंसान रहने का है। इसलिए मैं एक नॉवेलिस्ट (उपन्यासकार) हूँ और चूँकि मैं नॉवेलिस्ट हूँ इसलिए मैं अपने आप को किसी संत, किसी साइंटिस्ट, किसी दार्शनिक, किसी शायर से बेहतर
लखनऊ और उर्दू अदब
हर दौर का अदब (साहित्य) उस दौर की तहज़ीब (संस्कृति) का आईना होता है। लखनऊ को अठारहवीं सदी के मध्य से लेकर उन्नीसवीं सदी के आख़िर तक उत्तरी भारत की तहज़ीब में एक अहम दर्जा हासिल रहा है। औरंगज़ेब की वफ़ात (मृत्यु) के बाद दिल्ली की केंद्रीय हैसियत कमज़ोर
इक़बाल और तसव्वुफ़
रॉबर्ट फ्रॉस्ट का ज़िंदगी से झगड़ा एक प्रेमी का था। कुछ ऐसा ही झगड़ा इक़बाल का तसव्वुफ़ (सूफ़ीवाद) से है। शायद आलम खुंदमीरी ने जब इक़बाल के यहाँ तसव्वुफ़ के आकर्षण और उससे दूरी का ज़िक्र किया था तो उनके ज़ेहन में भी यही बात थी। बहरहाल यह तय है कि इक़बाल
उर्दू और हिन्दुस्तानी तहज़ीब
ज़ाहिर तौर पर उर्दू और हिंदुस्तानी तहज़ीब के विषय पर कुछ कहने की ज़रूरत नहीं होनी चाहिए थी क्योंकि उर्दू एक आधुनिक हिंदुस्तानी ज़बान है और हमारी साझी तहज़ीब की एक शानदार मिसाल है। लेकिन हुआ यह है कि कुछ हल्क़ों की तरफ़ से ऐसे विचार ज़ाहिर किए गए हैं
उर्दू-ए-मोअल्ला
उर्दू अदब के इतिहास में जिन पत्रिकाओं के नाम विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं, उनमें दिलगुदाज़, मख़्ज़न, उर्दू-ए-मुअल्ला, ज़माना, निगार और उर्दू प्रमुख हैं। इनमें उर्दू-ए-मुअल्ला कई मायनों में सबसे ऊपर है। यह पत्रिका मौलाना हसरत ने उस वक़्त निकाली जब वह बी.ए.
इक़बाल, फैज़ और हम
मैं उर्दू मरकज़ लंदन के पदाधिकारियों और सदस्यों का आभारी हूँ कि उन्होंने फ़ैज़ की पहली बरसी के मौक़े पर मुझे लंदन आने और पहला फ़ैज़ मेमोरियल लेक्चर देने का निमंत्रण दिया। फ़ैज़ की याद में लेक्चरों के सिलसिले की यह शुरुआत एक सराहनीय क़दम है और उम्मीद
हिन्दुस्तान की जंग-ए-आज़ादी में उर्दू का हिस्सा
आज कुछ हल्क़ों में यह प्रोपेगैंडा किया जा रहा है कि उर्दू का सारा सरमाया (पूंजी) विदेशी है, इसके अदीबों (साहित्यकारों) और शायरों की निगाहें वतन के बजाय बाहरी मुल्कों पर लगी होती हैं। इसके लिखने और पढ़ने वाले हिंदुस्तान से मुहब्बत नहीं रखते, उन्होंने
इम्ला और रस्म-ए-ख़त
1 / 5 मोहतरम सद्र (आदरणीय अध्यक्ष), मुख्य अतिथि, डायरेक्टर उर्दू शिक्षण और शोध केंद्र, देवियो और सज्जनो! मैं डायरेक्टर उर्दू शिक्षण और शोध केंद्र, लखनऊ का आभारी हूँ कि उन्होंने इस अहम सेमिनार के उद्घाटन के लिए मुझे याद किया। जब से यह केंद्र क़ायम हुआ
उर्दू शायरी में ख़मरियात
शेर-ओ-अदब में शराब का ज़िक्र इतनी कसरत से क्यों होता है, यह तो उस पुराने गुनहगार से पूछिए जो शराब के जाम से मस्त होना ही काफ़ी नहीं समझता, बल्कि शराब के जाम में डूब जाना चाहता है। मैं तो तौबत-उन-नसूह क़िस्म का आदमी हूँ, दूर से तमाशा देखने वाला! मैं आपको
उर्दू तन्क़ीद के बुनियादी अफ़्कार
उर्दू में तनक़ीद (आलोचना) पश्चिम की देन है। तनक़ीदी शऊर (आलोचनात्मक समझ) इससे पहले भी था और एक तरफ़ यह कलाकारों के इशारों और नुक़्तों (बातों) में ज़ाहिर होता था, तो दूसरी तरफ़ तज़किरों (जीवन-चरित्रों) की तारीफ़ और बुराई में। मगर इसकी ज़रूरत उसी वक़्त
इक़बाल और नई मशरक़िय्यत
1 / 4 इक़बाल ने अपने बारे में कहा है, कहता हूँ वही बात समझता हूँ जिसे हक़ मैं अबला-ए-मस्जिद हूँ न तहज़ीब का फ़रज़ंद 'अबला-ए-मस्जिद' (मस्जिद का भोला इंसान) उस पुरानी मशरिक़ियत (पूरब की परंपरा) का प्रतीक है जो एक ठहरी हुई धार्मिक सोच रखती है
अदब में इज़हार-ओ-इबलाग़ का मसअला
साहित्य बुनियादी तौर पर इंसानी जज़्बातों और एहसासों के इज़हार (अभिव्यक्ति) का ही नाम है। यह इज़हार रचनात्मक प्रेरणा और रुझान का नतीजा है, जिससे आम लोग कम ही परिचित होते हैं। आम लोग एहसास तो रखते हैं मगर उसका इज़हार नहीं कर सकते। उन्हें भाषा और बयान पर
ग़ज़ल की ज़बान और इक़बाल की ग़ज़ल की ज़बान
इक़बाल का एक शेर है, न ज़बां कोई ग़ज़ल की न ज़बां से बाख़बर मैं कोई दिल कुशा सदा हो, अजमी हो कि ताज़ी तो क्या वाक़ई ग़ज़ल की ज़बान की कोई ख़ासियत नहीं है? क्या यह सिर्फ़ शायराना ज़बान है या इस शायराना ज़बान की कुछ ख़ासियतें भी हैं। उर्दू ग़ज़ल का ख़ज़ाना
अदब में क़द्रों का मसअला
इक़बाल ने एक दफ़ा कहा था कि "जब शायर की आँखें खुली होती हैं तो समाज की आँखें बंद होती हैं और जब शायर की आँखें बंद हो जाती हैं तो समाज की आँखें खुलती हैं।" मैं यह कथन किसी पक्के सिद्धांत की तरह नहीं दोहरा रहा हूँ, बल्कि सिर्फ़ इस बात पर ज़ोर देना है कि
नज़्म की ज़बान
ज़बान की कल्पना समाज के बिना नहीं की जा सकती। व्यक्ति की अपनी कोई ज़बान नहीं होती, वह समाज से एक ज़बान सीखता है। लेखन के महत्व के बावजूद, ज़बान की बुनियाद बोलचाल में है। ज़बान सीख ली जाए तो यह एक आदत बन जाती है। ज़बान में तबकों (वर्गों) का फ़र्क़ भी
कुछ आतिश के बारे में
उर्दू में तनक़ीद (आलोचना) हाली से शुरू हुई। हाली ने जब होश संभाला तो विचार और कला पर लखनऊ का ख़ासा असर था। यहाँ तक कि ग़ालिब जैसा पारखी भी नासिख़ के रंग की तरफ़ कभी-कभी ललचाई हुई नज़रों से देख लेता था। हाली ने 'मजमूआ-ए-नज़्म-ए-हाल' की भूमिका में, 'मुसद्दस'
इक़बाल का कारनामा उर्दू नज़्म में
नज़्म का शब्द पहले तो शायरी के लिए इस्तेमाल होता था और इसके मुक़ाबले में गद्य (नस्र) को रखा जाता था। फिर यह ग़ज़ल के अलावा शायरी की दूसरी क़िस्मों के लिए इस्तेमाल होने लगी मगर नए संदर्भ में नज़्म वह काव्य विधा (सिन्फ़-ए-सुख़न) है जो न क़सीदा है न मसनवी,