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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

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राजेश रेड्डी

1952 | मुंबई, भारत

समाजिक सच्चाइयों को बेनक़ाब करने वाले लोकप्रिय शायर

समाजिक सच्चाइयों को बेनक़ाब करने वाले लोकप्रिय शायर

राजेश रेड्डी

ग़ज़ल 35

अशआर 40

दिल भी इक ज़िद पे अड़ा है किसी बच्चे की तरह

या तो सब कुछ ही इसे चाहिए या कुछ भी नहीं

शाम को जिस वक़्त ख़ाली हाथ घर जाता हूँ मैं

मुस्कुरा देते हैं बच्चे और मर जाता हूँ मैं

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मिरे दिल के किसी कोने में इक मासूम सा बच्चा

बड़ों की देख कर दुनिया बड़ा होने से डरता है

किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँ नहीं होता

मैं हर दिन जाग तो जाता हूँ ज़िंदा क्यूँ नहीं होता

यहाँ हर शख़्स हर पल हादसा होने से डरता है

खिलौना है जो मिट्टी का फ़ना होने से डरता है

पुस्तकें 2

 

वीडियो 18

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ऑडियो 10

अब क्या बताएँ टूटे हैं कितने कहाँ से हम

किसी दिन ज़िंदगानी में करिश्मा क्यूँ नहीं होता

जाने कितनी उड़ान बाक़ी है

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