Font by Mehr Nastaliq Web

aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair

jis ke hote hue hote the zamāne mere

रद करें डाउनलोड शेर
Saqi Faruqi's Photo'

प्रमुख और नई दिशा देने वाले आधुनिक शायर

प्रमुख और नई दिशा देने वाले आधुनिक शायर

साक़ी फ़ारुक़ी के शेर

34.9K
Favorite

श्रेणीबद्ध करें

मुझे ख़बर थी मिरा इंतिज़ार घर में रहा

ये हादसा था कि मैं उम्र भर सफ़र में रहा

मुद्दत हुई इक शख़्स ने दिल तोड़ दिया था

इस वास्ते अपनों से मोहब्बत नहीं करते

इक याद की मौजूदगी सह भी नहीं सकते

ये बात किसी और से कह भी नहीं सकते

ये क्या तिलिस्म है क्यूँ रात भर सिसकता हूँ

वो कौन है जो दियों में जला रहा है मुझे

अब घर भी नहीं घर की तमन्ना भी नहीं है

मुद्दत हुई सोचा था कि घर जाएँगे इक दिन

मुझ को मिरी शिकस्त की दोहरी सज़ा मिली

तुझ से बिछड़ के ज़िंदगी दुनिया से जा मिली

मुझ में सात समुंदर शोर मचाते हैं

एक ख़याल ने दहशत फैला रक्खी है

ख़ुदा के वास्ते मौक़ा दे शिकायत का

कि दोस्ती की तरह दुश्मनी निभाया कर

नामों का इक हुजूम सही मेरे आस-पास

दिल सुन के एक नाम धड़कता ज़रूर है

प्यास बढ़ती जा रही है बहता दरिया देख कर

भागती जाती हैं लहरें ये तमाशा देख कर

वही आँखों में और आँखों से पोशीदा भी रहता है

मिरी यादों में इक भूला हुआ चेहरा भी रहता है

तमाम जिस्म की उर्यानियाँ थीं आँखों में

वो मेरी रूह में उतरा हिजाब पहने हुए

मैं ने चाहा था कि अश्कों का तमाशा देखूँ

और आँखों का ख़ज़ाना था कि ख़ाली निकला

रास्ता दे कि मोहब्बत में बदन शामिल है

मैं फ़क़त रूह नहीं हूँ मुझे हल्का समझ

मैं खिल नहीं सका कि मुझे नम नहीं मिला

साक़ी मिरे मिज़ाज का मौसम नहीं मिला

वो मिरी रूह की उलझन का सबब जानता है

जिस्म की प्यास बुझाने पे भी राज़ी निकला

व्याख्या

इस शे’र का विषय “रूह की उलझन” पर स्थित है। आत्मा की शरीर से अनुरूपता ख़ूब है। शायर का यह कहना है कि वो अर्थात उसका प्रिय उसकी आत्मा की उलझन का कारण जानता है। यानी मेरी आत्मा किस उलझन में है उसे अच्छी तरह मालूम है। मैं ये सोचता था कि वो सिर्फ़ मेरी आत्मा की उलझन को दूर करेगा मगर वो तो मेरे शरीर की प्यास बुझाने के लिए भी राज़ी होगया। दूसरे मिसरे में शब्द “भी” बहुत अर्थपूर्ण है। इससे स्पष्ट होता है कि शायर का प्रिय हालांकि यह जानता है कि वो आत्मा की उलझन में ग्रस्त है और आत्मा और शरीर के बीच एक तरह का अंतर्विरोध है। जिसका यह अर्थ है कि मेरे प्रिय को मालूम था कि मेरी आत्मा के भ्रम की वजह वास्तव में शरीर की प्यास ही है मगर प्रिय आत्मा की जगह उसके शरीर की प्यास बुझाने के लिए तैयार हो गया।

शफ़क़ सुपुरी

तुम और किसी के हो तो हम और किसी के

और दोनों ही क़िस्मत की शिकायत नहीं करते

मैं उन से भी मिला करता हूँ जिन से दिल नहीं मिलता

मगर ख़ुद से बिछड़ जाने का अंदेशा भी रहता है

मैं अपने शहर से मायूस हो के लौट आया

पुराने सोग बसे थे नए मकानों में

तुझ से मिलने का रास्ता बस एक

और बिछड़ने के रास्ते हैं बहुत

एक एक कर के लोग बिछड़ते चले गए

ये क्या हुआ कि वक़्फ़ा-ए-मातम नहीं मिला

लोग लम्हों में ज़िंदा रहते हैं

वक़्त अकेला इसी सबब से है

मुझे समझने की कोशिश की मोहब्बत ने

ये और बात ज़रा पेचदार मैं भी था

दुनिया पे अपने इल्म की परछाइयाँ डाल

रौशनी-फ़रोश अंधेरा कर अभी

क़त्ल करने का इरादा है मगर सोचता हूँ

तू अगर आए तो हाथों में झिजक पैदा हो

जिस की हवस के वास्ते दुनिया हुई अज़ीज़

वापस हुए तो उस की मोहब्बत ख़फ़ा मिली

बुझे लबों पे है बोसों की राख बिखरी हुई

मैं इस बहार में ये राख भी उड़ा दूँगा

तेरे चेहरे पे उजाले की सख़ावत ऐसी

और मिरी रूह में नादार अंधेरा ऐसा

सुब्ह तक रात की ज़ंजीर पिघल जाएगी

लोग पागल हैं सितारों से उलझना कैसा

आग हो दिल में तो आँखों में धनक पैदा हो

रूह में रौशनी लहजे में चमक पैदा हो

मुझे गुनाह में अपना सुराग़ मिलता है

वगरना पारसा-ओ-दीन-दार मैं भी था

ख़ामुशी छेड़ रही है कोई नौहा अपना

टूटता जाता है आवाज़ से रिश्ता अपना

दिल ही अय्यार है बे-वज्ह धड़क उठता है

वर्ना अफ़्सुर्दा हवाओं में बुलावा कैसा

मैं अपनी आँखों से अपना ज़वाल देखता हूँ

मैं बेवफ़ा हूँ मगर बे-ख़बर जान मुझे

ख़ाक मैं उस की जुदाई में परेशान फिरूँ

जब कि ये मिलना बिछड़ना मिरी मर्ज़ी निकला

वो ख़ुदा है तो मिरी रूह में इक़रार करे

क्यूँ परेशान करे दूर का बसने वाला

रूह में रेंगती रहती है गुनह की ख़्वाहिश

इस अमरबेल को इक दिन कोई दीवार मिले

वही जीने की आज़ादी वही मरने की जल्दी है

दिवाली देख ली हम ने दसहरे कर लिए हम ने

हम तंगना-ए-हिज्र से बाहर नहीं गए

तुझ से बिछड़ के ज़िंदा रहे मर नहीं गए

अजब कि सब्र की मीआद बढ़ती जाती है

ये कौन लोग हैं फ़रियाद क्यूँ नहीं करते

डूब जाने का सलीक़ा नहीं आया वर्ना

दिल में गिर्दाब थे लहरों की नज़र में हम थे

उस के वारिस नज़र नहीं आए

शायद उस लाश के पते हैं बहुत

मेरे अंदर उसे खोने की तमन्ना क्यूँ है

जिस के मिलने से मिरी ज़ात को इज़हार मिले

मेरी अय्यार निगाहों से वफ़ा माँगता है

वो भी मोहताज मिला वो भी सवाली निकला

मेरी आँखों में अनोखे जुर्म की तज्वीज़ थी

सिर्फ़ देखा था उसे उस का बदन मैला हुआ

हादसा ये है कि हम जाँ मोअत्तर कर पाए

वो तो ख़ुश-बू था उसे यूँ भी बिखर जाना था

मैं तो ख़ुदा के साथ वफ़ादार भी रहा

ये ज़ात का तिलिस्म मगर टूटता नहीं

अभी नज़र में ठहर ध्यान से उतर के जा

इस एक आन में सब कुछ तबाह कर के जा

मिट जाएगा सेहर तुम्हारी आँखों का

अपने पास बुला लेगी दुनिया इक दिन

मिरा अकेला ख़ुदा याद रहा है मुझे

ये सोचता हुआ गिरजा बुला रहा है मुझे

Recitation

Jashn-e-Rekhta 10th Edition | 5-6-7 December Get Tickets Here

बोलिए