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असलम महमूद

कानपुर, भारत

ग़ज़ल 21

शेर 19

गुज़रते जा रहे हैं क़ाफ़िले तू ही ज़रा रुक जा

ग़ुबार-ए-राह तेरे साथ चलना चाहता हूँ मैं

देख कर कि तिरे हिज्र में भी ज़िंदा हैं

तुझ से बिछड़े थे तो लगता था कि मर जाएँगे

पाँव उस के भी नहीं उठते मिरे घर की तरफ़

और अब के रास्ता बदला हुआ मेरा भी है

ई-पुस्तक 633

Auraq-e-Aziz

 

1999

Bachchon ki Kitabein

 

1977

Baharistan-e-Ashar

 

1913

Dastan-e-Ajam

Part-001

1945

Deewan-e-Jalib

 

 

Deewan-e-Talib Manakpuri

Maroof ba Armughan-e-Khayal

1933

Fehrist Kutub

 

 

Fehrist Kutub

 

1975

Fehrist-e-Kutub

 

1999

Hindu Shora

 

1931

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