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मोहम्मद अहमद रम्ज़

1932 - | कानपुर, भारत

नई ग़ज़ल के प्रतिष्ठित शायर

नई ग़ज़ल के प्रतिष्ठित शायर

ग़ज़ल 33

शेर 11

अब के वस्ल का मौसम यूँही बेचैनी में बीत गया

उस के होंटों पर चाहत का फूल खिला भी कितनी देर

इक सच की आवाज़ में हैं जीने के हज़ार आहंग

लश्कर की कसरत पे जाना बैअत मत करना

उस का तरकश ख़ाली होने वाला है

मेरे नाम का तीर है कितने तीरों में

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