पाशा रहमान के शेर
अब जाँ से गुज़र जा कि तक़ाज़ा-ए-जुनूँ है
'पाशा' तिरी उल्फ़त पे उसे शक हुआ कैसे
-
शेयर कीजिए
- सुझाव
- प्रतिक्रिया
- डाउनलोड
क्या शहर-ए-वफ़ा मुस्तक़र-ए-बुल-हवसाँ है
चेहरा परी-चेहरों का भयानक हुआ कैसे
-
शेयर कीजिए
- सुझाव
- प्रतिक्रिया
- डाउनलोड
शेवा तो तिरा सिर्फ़ सितम था सितम-ईजाद
इख़्लास-ओ-मुरव्वत तिरा मस्लक हुआ कैसे
-
शेयर कीजिए
- सुझाव
- प्रतिक्रिया
- डाउनलोड
इस नगरी में 'पाशा' साहब किस को समझाओगे
हर इक की अपनी डफ़ली हर इक का अपना राग
-
शेयर कीजिए
- सुझाव
- प्रतिक्रिया
- डाउनलोड
वो एक शख़्स जो महफ़िल में बोलता था बहुत
सुना है अहल-ए-नज़र से वो खोखला था बहुत
-
शेयर कीजिए
- ग़ज़ल देखिए
- सुझाव
- प्रतिक्रिया
- डाउनलोड