- पुस्तक सूची 177592
-
-
पुस्तकें विषयानुसार
-
गतिविधियाँ86
बाल-साहित्य1989
नाटक / ड्रामा919 एजुकेशन / शिक्षण344 लेख एवं परिचय1379 कि़स्सा / दास्तान1582 स्वास्थ्य105 इतिहास3278हास्य-व्यंग607 पत्रकारिता202 भाषा एवं साहित्य1706 पत्र738
जीवन शैली30 औषधि980 आंदोलन272 नॉवेल / उपन्यास4300 राजनीतिक354 धर्म-शास्त्र4755 शोध एवं समीक्षा6601अफ़साना2680 स्केच / ख़ाका242 सामाजिक मुद्दे109 सूफ़ीवाद / रहस्यवाद2038पाठ्य पुस्तक451 अनुवाद4248महिलाओं की रचनाएँ5831-
पुस्तकें विषयानुसार
- बैत-बाज़ी14
- अनुक्रमणिका / सूची4
- अशआर68
- दीवान1278
- दोहा48
- महा-काव्य100
- व्याख्या181
- गीत63
- ग़ज़ल1257
- हाइकु11
- हम्द52
- हास्य-व्यंग31
- संकलन1599
- कह-मुकरनी7
- कुल्लियात580
- माहिया20
- काव्य संग्रह4854
- मर्सिया386
- मसनवी746
- मुसद्दस42
- नात580
- नज़्म1193
- अन्य82
- पहेली15
- क़सीदा182
- क़व्वाली17
- क़ित'अ67
- रुबाई272
- मुख़म्मस15
- रेख़्ती12
- शेष-रचनाएं17
- सलाम34
- सेहरा12
- शहर आशोब, हज्व, ज़टल नामा17
- तारीख-गोई26
- अनुवाद74
- वासोख़्त25
अल्ताफ़ फ़ातिमा की कहानियाँ
नंगी मुर्गियां
यह कहानी आधुनिकता के बहाव में हो रहे औरतों के शोषण की बात करती है। ख़ुद-मुख़्तारी, आज़ादी और आत्म-निर्भर होने के चक्कर में औरतें समाज और परिवार में अपनी हक़ीक़त तक को भूल गई हैं। पश्चिम के प्रभाव में वे ऐसे कपड़े पहन रही हैं कि कपड़े पहनने के बाद भी वो नंगी नज़र आती हैं, जिन्हें कोई कपड़े पहनाने की कोशिश भी नहीं कर सकता।
सोन गुड़ियाँ
तब वो दिन-भर की थकी हारी दबे पाँव उस कोठरी की तरफ़ बढ़ती, जहाँ दिन-भर और रात गए तक काम ख़िदमत में मसरूफ़ रहने के बाद आराम करती, और फिर एक बार इधर-उधर नज़र डालने के बाद कि आस-पास कोई जागता या देखता तो नहीं, वो कोठरी के किवाड़ बंद कर लेती। ताक़ पर से डिब्बे
कहीं ये पुरवाई तो नहीं
तक़सीम से पैदा हुए हालात के दर्द को बयान करती कहानी है। अचानक लिखते हुए जब खिड़की से पुर्वाई का एक झोंका आया तो उसे बीते हुए दिनों की याद ने अपनी आग़ोश में ले लिया। बचपन में स्कूल के दिन, झूलते, खाते और पढ़ाई करते दिन। वे दिन जब वे घर के मुलाज़िम के बेटे रब्बी दत्त के पास पढ़ने जाया करते थे। रब्बी दत्त, जो उन्हें अपनी बहन मानता था और उनसे राखी बंधवाया करता था। मगर अब न तो राखी बंधवाने वाला कोई था और न ही उसकी दक्षिणा देने वाला।
दर्द-ए-ला-दवा
यह कहानी हाथ से कालीन बुन्ने वाले दस्तकारों के हुनर और उनके आर्थिक और शारीरिक उत्पीड़न को बयान करती है। कालीन बुनने वाले लोग करघे में कितने रंगों और किस सफ़ाई के साथ काम करते हैं। उनके इस काम में उनकी उंगलियाँ सबसे ज़्यादा मददगार होती हैं। मगर एक वक़्त के बाद ये उंगलियाँ ख़राब भी हो जाती हैं। उस करघे में काम करने वाले सबसे हुनरमंद लड़की के साथ भी यही हुआ था। फिर रही-सही क़सर करघों की जगह ईजाद हुई मशीनों ने पूरी कर दी।
नियॉन साइंज़
यह एक ऐसी लड़की की कहानी है जो अपने साथी के साथ एक सर्द, अंधेरी रात में सड़क पर चली जा रही है। वह एक जानी-पहचानी सड़क है, मगर उससे गुज़रते हुए उन्हें डर लग रहा है। उस सड़क पर एक विशाल बरगद का पेड़ भी है, जिसके मुताल्लिक़ उस लड़की का साथी उसे एक दास्तान सुनाता है जब उसने उसके पास उस नियॉन साइंज़ को देखा था, जिसमें ढेरों गोल-गोल दायरे थे। दर हक़ीक़त वे दायरे कुछ और नहीं बल्कि ज़िंदगी की शक़्ल पर उभरे हुए धब्बे थे।
छोटा
यह कहानी बाल-मज़दूर के रूप में होटलों और ढ़ाबों में काम करनेवाले बच्चों के शोषण को बयान करती है। बाज़ार से लगा हुआ वह इलाक़ा एकदम सुनसान था। फिर वहाँ आकर कुछ लोग रहने लगे, जिनमें कई छोटे बच्चे भी थे। देखते ही देखते ही वह इलाक़ा काफ़ी फल-फूल गया और वहाँ बस्ती के साथ कई तरह के होटल भी उभर आए। उन्हीं होटलों में से एक में 'छोटा' भी काम करता था, जो काम के साथ-साथ मालिक की गालियाँ, झिड़कियाँ और मार भी सहता था।
सांख्या योगी
यह कहानी हिंदू धार्मिक ग्रंथ गीता के उपदेश के गिर्द घूमती है, जिसमें कर्म योग और सांख्य योग पर विचार किया गया है। कर्म योगी हमेशा सांख्य योग पर भारी पड़ता है, कि वह संन्यासी होता है, मगर वह कर्म योगी नहीं बन सका था, उसे जो काम सौंपा गया था उसे करने में वह नाकाम रहा था। फ़ाइटर जेट में सवार होकर जब वह लाहौर पर बम गिराने गया था तो उसने महज़ इसलिए इस काम पर अमल करने से इंकार कर दिया था क्योंकि उस शहर की किसी बस्ती में उसकी माशूक़ा रहती थी।
शीर-दहान
यह एक ऐसी किताबों की दुकान की कहानी है, जो अपने ज़माने में बहुत मशहूर थी। इलाक़े के हर उम्र के लोग उस दुकान में आया करते थे और अपनी पसंद की किताबें ले जाकर पढ़ा करते थे। धीरे-धीरे वक़्त बीता और लोगों की ज़िंदगियों में मनोरंजन के दूसरे साधन शामिल होते गए। लोगों ने उस दुकान की तरफ़ जाना छोड़ दिया। दुकान का मालिक ख़ामोश बैठा रहता है, उसका ख़याल है कि यह वक़्त शेर का मुँह है जो सारी चीज़ों को निगलता जा रहा है।
कमंद-ए-हवा
यह कहानी विभाजन की वीभिषिका में इंसानों और परिवारों के टूटने, बिखरने और फिर विस्थापित हो जाने के दर्द की दास्तान बयान करती है। वो घर, उनमें बसे लोग और उनसे जुड़ी यादें, जो महज़़ एक हवा के झोंके से बिखर कर रह गई। फिर ऐसा भी नहीं है कि उसके बाद वह हवा रुक गई हो। वह अभी भी लगातार चल रही है और उसके बहाव में लोग अपनी जड़ों से कट कर यहाँ-वहाँ बिखरे फिर रहे हैं।
join rekhta family!
-
गतिविधियाँ86
बाल-साहित्य1989
-
