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अमर अबदाबादी

1910 - 1992 | चंडीगढ़, भारत

उर्दू के साहित्यकार, पत्रकार, शायर और संपादक, उर्दू पत्रकारिता, राष्ट्रीय एकता और साहित्यिक सेवाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका निभाई

उर्दू के साहित्यकार, पत्रकार, शायर और संपादक, उर्दू पत्रकारिता, राष्ट्रीय एकता और साहित्यिक सेवाओं के क्षेत्र में उल्लेखनीय भूमिका निभाई

अमर अबदाबादी के शेर

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छुपा कर दिल में ले जाएँगे जो जो दिल पे गुज़री है

हम इस ना-क़द्र दुनिया को ये अफ़्साने नहीं देंगे

बता शम' किस ग़म में जलेगी

अगर जाँ तुझ पे परवाने देंगे

कहाँ की 'आशिक़ी कैसी मोहब्बत दिल का आना क्या

हवस का नाम मिल कर रख लिया है 'आशिक़ी हम ने

किस लिए तेज़ हुई जाती है दिल की धड़कन

आप ने देखा है मुझ को कहीं ऐसा तो नहीं

'इश्क़ और मुश्क छुपाए कहीं छुपते हैं 'अमर'

लाख पर्दा करो दुनिया से ये पर्दा तो नहीं

तुम्हारी बज़्म में हर दो तरफ़ थी एक मजबूरी

तुम ने मद-भरी आँखें उठाईं और पी हम ने

अपने गिरने का तो अफ़सोस नहीं है मुझ को

देखना ये है किसी ने मुझे देखा तो नहीं

मलेंगे आप भी दस्त-ए-तअस्सुफ़

अगर हम को सुकूँ पाने देंगे

करते उन से इज़्हार-ए-तमन्ना हम तो अच्छा था

तमन्ना तो गँवाई थी गँवाई बात भी हम ने

देखा जाएगा उन की महफ़िल में

मैं नहीं आज या रक़ीब नहीं

बहुत देखा है हम ने उन का वा'दा

उन्हें अब दिल को बहकाने देंगे

हमें ख़्वाह 'आम ही करना पड़े फ़ैज़ान-ए-मय-ख़ाना

मगर हम शैख़ को दुनिया को बहकाने नहीं देंगे

हम बहकते कभी यूँ साक़ी

तेरे हाथों जो पी नहीं होती

यूँ तो तक़दीर से हैं सब बेबस

'इश्क़ सी बेबसी नहीं होती

उन से मिलना तो कुछ नहीं मुश्किल

लेकिन ऐसे मिरे नसीब नहीं

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