परवाना शायरी

परवाना उर्दू शायरी का वह इस्तिआरा है जिसने इश्क़ करने वालों के जांनिसारी के जज़्बे को अमर कर दिया। एक पतंग जो रोशनी पर दीवानों की तरह कुर्बान होता है, कैसे उर्दू शायरों के दर्मियान इस क़दर हर-दिल-अज़ीज़ है, इस राज़ से पर्दा उठाने के लिए परवाना शायरी का यह इंतिख़ाब शायद काफ़ी हो। आइये एक निगाह डालते चलेः

सब इक चराग़ के परवाने होना चाहते हैं

अजीब लोग हैं दीवाने होना चाहते हैं

असअ'द बदायुनी

होती कहाँ है दिल से जुदा दिल की आरज़ू

जाता कहाँ है शम्अ को परवाना छोड़ कर

जलील मानिकपूरी

तू कहीं हो दिल-ए-दीवाना वहाँ पहुँचेगा

शम्अ होगी जहाँ परवाना वहाँ पहुँचेगा

बहादुर शाह ज़फ़र

ख़ुद ही परवाने जल गए वर्ना

शम्अ जलती है रौशनी के लिए

the moths got burned in their own plight

the flame just burns to shed some light

सनम प्रतापगढ़ी

परवानों का तो हश्र जो होना था हो चुका

गुज़री है रात शम्अ पे क्या देखते चलें

शाद अज़ीमाबादी

यूँ तो जल बुझने में दोनों हैं बराबर लेकिन

वो कहाँ शम्अ में जो आग है परवाने में

जलील मानिकपूरी

ख़ुद भी जलती है अगर उस को जलाती है ये

कम किसी तरह नहीं शम्अ भी परवाने से

it aslo burns itself if it sears him

the flame is not lesser than the moth in any way

अज्ञात

मत करो शम्अ कूँ बदनाम जलाती वो नहीं

आप सीं शौक़ पतंगों को है जल जाने का

cast not blame upon the flame it doesn’t burn to sear

the moths are

सिराज औरंगाबादी

परवाने ही जाएँगे खिंच कर ब-जब्र-ए-इश्क़

महफ़िल में सिर्फ़ शम्अ जलाने की देर है

माहिर-उल क़ादरी

ये अपने दिल की लगी को बुझाने आते हैं

पराई आग में जलते नहीं हैं परवाने

they come to extinguish the fire in their heart

in senseless immolation the moths do not take part

मख़मूर सईदी

शम्अ पर ख़ून का इल्ज़ाम हो साबित क्यूँ-कर

फूँक दी लाश भी कम्बख़्त ने परवाने की

जलील मानिकपूरी

जाने क्या महफ़िल-ए-परवाना में देखा उस ने

फिर ज़बाँ खुल सकी शम्अ जो ख़ामोश हुई

अलीम मसरूर

परवाने की तपिश ने ख़ुदा जाने कान में

क्या कह दिया कि शम्अ के सर से धुआँ उठा

इस्माइल मेरठी

मूजिद जो नूर का है वो मेरा चराग़ है

परवाना हूँ मैं अंजुमन-ए-काएनात का

आग़ा हज्जू शरफ़

इश्क़ में निस्बत नहीं बुलबुल को परवाने के साथ

वस्ल में वो जान दे ये हिज्र में जीती रहे

जाफ़र अली खां ज़की

मिस्ल-ए-परवाना फ़िदा हर एक का दिल हो गया

यार जिस महफ़िल में बैठा शम-ए-महफ़िल हो गया

जलील मानिकपूरी

शम्अ' बुझ कर रह गई परवाना जल कर रह गया

यादगार-ए-हुस्न-ओ-इश्क़ इक दाग़ दिल पर रह गया

अज़ीज़ लखनवी

तारीकी में होता है उसे वस्ल मयस्सर

परवाना कहाँ जाए शबिस्ताँ से निकल कर

मुसहफ़ी ग़ुलाम हमदानी

ख़ाक कर देवे जला कर पहले फिर टिसवे बहाए

शम्अ मज्लिस में बड़ी दिल-सोज़ परवाने की है

शैख़ ज़हूरूद्दीन हातिम