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माहिर-उल क़ादरी

1906 - 1978 | कराची, पाकिस्तान

शेर 10

ये कह के दिल ने मिरे हौसले बढ़ाए हैं

ग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साए हैं

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अक़्ल कहती है दोबारा आज़माना जहल है

दिल ये कहता है फ़रेब-ए-दोस्त खाते जाइए

इक बार तुझे अक़्ल ने चाहा था भुलाना

सौ बार जुनूँ ने तिरी तस्वीर दिखा दी

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ग़ज़ल 17

नज़्म 1

 

पुस्तकें 202

Durr-e-Yateem

 

2010

Durr-e-Yateem

 

1971

फ़िर्दौस

 

1955

Jazbat-e-Mahir

 

 

कारवान-ए-हिजाज़

 

 

किरदार

 

1944

Kulliyat-e-Mahir

 

1994

Mahir-ul-Qadiri Ke Sau Sher

 

 

Mahsusat-e-Mahir

 

1943

Naghmat-e-Mahir

 

1943

चित्र शायरी 2

ज़रा दरिया की तह तक तो पहुँच जाने की हिम्मत कर तो फिर ऐ डूबने वाले किनारा ही किनारा है

ये कह के दिल ने मिरे हौसले बढ़ाए हैं ग़मों की धूप के आगे ख़ुशी के साए हैं

 

वीडियो 4

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ऑडियो 9

अगर फ़ितरत का हर अंदाज़ बेबाकाना हो जाए

अभी दश्त-ए-कर्बला में है बुलंद ये तराना

ऐ निगाह-ए-दोस्त ये क्या हो गया क्या कर दिया

Recitation

aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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