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ग़ज़नफ़र

1953 | दिल्ली, भारत

शायर, आलोचक और कथा लेखक, संवेदनशील सामाजिक विषयों पर उपन्यास और कहानी लेखन के लिए मशहूर।

शायर, आलोचक और कथा लेखक, संवेदनशील सामाजिक विषयों पर उपन्यास और कहानी लेखन के लिए मशहूर।

कहानी 21

शेर 13

बच के दुनिया से घर चले आए

घर से बचने मगर किधर जाएँ

हर एक रात कहीं दूर भाग जाता हूँ

हर एक सुब्ह कोई मुझ को खींच लाता है

मैं उस के झूट को भी सच समझ के सुनता हूँ

कि उस के झूट में भी ज़िंदगी की क़ुव्वत है

ग़ज़ल 14

नज़्म 6

पुस्तकें 33

आँख में लुक्नत

 

2015

Divya Bani

 

2000

फ़िक्शन से अलग

 

2013

Fusoon

 

2003

Ghazanfar: Urdu Fiction Ki Ek Motabar Awaz

 

2006

Hairat Farosh

 

2006

Jadeed Tariqa-e-Tadris

 

2008

Kahani Uncle

 

1994

Khush Rang Chehre

 

2018

Lisani Khel

 

2014

चित्र शायरी 1

अपनी नज़र में भी तो वो अपना नहीं रहा चेहरे पे आदमी के है चेहरा चढ़ा हुआ मंज़र था आँख भी थी तमन्ना-ए-दीद भी लेकिन किसी ने दीद पे पहरा बिठा दिया ऐसा करें कि सारा समुंदर उछल पड़े कब तक यूँ सत्ह-ए-आब पे देखेंगे बुलबुला बरसों से इक मकान में रहते हैं साथ साथ लेकिन हमारे बीच ज़मानों का फ़ासला मजमा' था डुगडुगी थी मदारी भी था मगर हैरत है फिर भी कोई तमाशा नहीं हुआ आँखें बुझी बुझी सी हैं बाज़ू थके थके ऐसे में कोई तीर चलाने का फ़ाएदा वो बे-कसी कि आँख खुली थी मिरी मगर ज़ौक़-ए-नज़र पे जब्र ने पहरा बिठा दिया

 

वीडियो 8

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वीडियो का सेक्शन
शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

ग़ज़नफ़र

कभी तो मूँद लें आँखे कभी नज़र खोलें

ग़ज़नफ़र

नए आदमी का कंफ़ेशन

कभी ये भी ख़्वाहिश परेशान करती है मुझ को ग़ज़नफ़र

महा-भारत

बिन-लादेन ग़ज़नफ़र

ये तमन्ना नहीं कि मर जाएँ

ग़ज़नफ़र

यक़ीन जानिए इस में कोई करामत है

ग़ज़नफ़र

सामान-ए-ऐश सारा हमें यूँ तू दे गया

ग़ज़नफ़र

हिजरत

वो आग़ोश जिस में पले ग़ज़नफ़र

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