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ख़लीक़ अंजुम का परिचय
पहचान: प्रख्यात शोधकर्ता, ग़ालिब-विशेषज्ञ, पाठालोचक, दिल्ली-विद् और अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू के पूर्व महासचिव
डॉ. ख़लीक़ अंजुम का जन्म 22 दिसंबर 1935 को दिल्ली में हुआ। उनका जन्मनाम गुलाम अहमद था, जो बाद में ख़लीक़ अहमद और फिर साहित्यिक जगत में ख़लीक़ अंजुम के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उनके पूर्वज रोहिल्ला पठान थे, जबकि ननिहाल का परिवार ज्ञान और अध्यापन से जुड़ा हुआ था। बचपन में ही पिता का साया उठ गया, इसलिए उनकी माता कैसर सुल्ताना ने बड़े धैर्य और संकल्प के साथ उनका पालन-पोषण किया।
उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा एंग्लो-अरबिक हायर सेकेंडरी स्कूल, दिल्ली में प्राप्त की। इसके बाद अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय और फिर दिल्ली विश्वविद्यालय से उच्च शिक्षा पूरी की। दिल्ली विश्वविद्यालय से एम.ए. के बाद प्रोफेसर ख़्वाजा अहमद फ़ारूक़ी के निर्देशन में “मिर्ज़ा मज़हर जान-ए-जानाँ” पर शोध कर पीएचडी की उपाधि प्राप्त की।
डॉ. ख़लीक़ अंजुम उर्दू साहित्य की बहुआयामी हस्ती थे। वे शोधकर्ता, आलोचक, अनुवादक, पत्रकार, रेखाचित्रकार और संपादक के रूप में विख्यात थे। उनकी पुस्तकों की संख्या साठ से अधिक है और उर्दू अनुसंधान एवं संपादन के क्षेत्र में उनकी सेवाएँ अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जाती हैं।
उनकी सबसे बड़ी पहचान ग़ालिब-विशेषज्ञ के रूप में है। ग़ालिब अध्ययन के क्षेत्र में उनका कार्य असाधारण महत्व रखता है। विशेष रूप से पाँच खंडों में संपादित “ख़ुतूत-ए-ग़ालिब” ने उन्हें ग़ालिब-विशेषज्ञों की अग्रिम पंक्ति में स्थापित किया। उन्होंने ग़ालिब के पत्रों को पहली बार पूर्ण, प्रमाणिक और संशोधित रूप में प्रस्तुत किया।
ग़ालिब पर उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण पुस्तकों में शामिल हैं:
ग़ालिब की नादिर तहरीरें
ग़ालिब और शाहान-ए-तैमूरिया
ग़ालिब: कुछ मज़ामीन
ग़ालिब का सफ़र-ए-कलकत्ता और कलकत्ते का अदबी मआरका
इंतिख़ाब-ए-ख़ुतूत-ए-ग़ालिब (उर्दू व हिंदी)
अनुसंधान और संपादन के क्षेत्र में उनकी पुस्तक “मत्नी तनक़ीद” मील का पत्थर मानी जाती है, जिसके माध्यम से उन्होंने पहली बार उर्दू में पाठालोचना के सिद्धांतों को व्यवस्थित और वैज्ञानिक ढंग से प्रस्तुत किया तथा उर्दू शोध को नई दिशा दी।
डॉ. ख़लीक़ अंजुम को दिल्ली, उसकी तहज़ीब, इतिहास और पुरातात्त्विक धरोहर से विशेष लगाव था। इस विषय पर उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं:
आसार-उस-सनादीद (संपादन)
रसूम-ए-दिल्ली
दिल्ली के आसार-ए-क़दीमा
दिल्ली की दरगाह शाह मर्दाँ
मुरक़्क़ा-ए-दिल्ली
उनकी रेखाचित्रात्मक पुस्तक “मुझे सब है याद ज़रा ज़रा” महत्वपूर्ण व्यक्तिचित्रों का संग्रह है, जिसमें उर्दू की अनेक प्रमुख हस्तियों के प्रभावशाली रेखाचित्र शामिल हैं।
अनुवाद के क्षेत्र में भी उनकी सेवाएँ उल्लेखनीय हैं। उन्होंने अनेक महत्वपूर्ण फ़ारसी और अंग्रेज़ी ग्रंथों का उर्दू अनुवाद किया तथा “फ़न-ए-तरजुमा निगारी” शीर्षक से अनुवाद-कला पर भी एक महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी।
डॉ. ख़लीक़ अंजुम लगभग 37 वर्षों तक अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू से जुड़े रहे और इस संस्था के माध्यम से उर्दू भाषा और साहित्य के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने संस्था की पत्रिकाओं “उर्दू अदब” और “हमारी ज़बान” में भी लगातार सेवाएँ दीं।
डॉ. ख़लीक़ अंजुम उर्दू शोध, ग़ालिब अध्ययन, पाठालोचना और दिल्ली-शास्त्र के क्षेत्र में एक प्रामाणिक नाम हैं। उनकी विद्वत्तापूर्ण सेवाओं ने उर्दू अनुसंधान के स्तर को ऊँचा किया और उर्दू साहित्य को बहुमूल्य निधि प्रदान की।
निधन: 18 अक्तूबर 2016 को उनका देहांत हुआ।
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