मजीद अमजद
पुस्तकें 4
चित्र शायरी 3
जुनून-ए-इश्क़ की रस्म-ए-अजीब क्या कहना मैं उन से दूर वो मेरे क़रीब क्या कहना ये तीरगी-ए-मुसलसल में एक वक़्फ़ा-ए-नूर ये ज़िंदगी का तिलिस्म-ए-अजीब क्या कहना जो तुम हो बर्क़-ए-नशेमन तो मैं नशेमन-ए-बर्क़ उलझ पड़े हैं हमारे नसीब क्या कहना हुजूम-ए-रंग फ़रावाँ सही मगर फिर भी बहार नौहा-ए-सद अंदलीब क्या कहना हज़ार क़ाफ़िला-ए-ज़िंदगी की तीरा-शबी ये रौशनी सी उफ़ुक़ के क़रीब क्या कहना लरज़ गई तिरी लौ मेरे डगमगाने से चराग़-ए-गोशा-ए-कू-ए-हबीब क्या कहना
ऑडियो 16
इक उम्र दिल की घात से तुझ पर निगाह की
और अब ये कहता हूँ ये जुर्म तो रवा रखता
कभी तो सोच तिरे सामने नहीं गुज़रे
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