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मुशफ़िक़ ख़्वाजा

1935 - 2005 | कराची, पाकिस्तान

पाकिस्तान के अग्रणी हास्य-व्यंग लेखक, अपने कॉलम 'ख़ामा-बगोश' के लिए विख्यात।

पाकिस्तान के अग्रणी हास्य-व्यंग लेखक, अपने कॉलम 'ख़ामा-बगोश' के लिए विख्यात।

मुशफ़िक़ ख़्वाजा

अशआर 7

ये लम्हा लम्हा ज़िंदा रहने की ख़्वाहिश का हासिल है

कि लहज़ा लहज़ा अपने आप ही में मर रहा हूँ मैं

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मिरी नज़र में गए मौसमों के रंग भी हैं

जो आने वाले हैं उन मौसमों से डरना क्या

दिल एक और हज़ार आज़माइशें ग़म की

दिया जला तो था लेकिन हवा की ज़द पर था

नज़र चुरा के वो गुज़रा क़रीब से लेकिन

नज़र बचा के मुझे देखता भी जाता था

ये हाल है मिरे दीवार-ओ-दर की वहशत का

कि मेरे होते हुए भी मकान ख़ाली है

ग़ज़ल 23

क़िस्सा 2

 

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
ऐ मुश्फ़िक़-ए-मन इस हाल में तुम किस तरह बसर फ़रमाओगे

मुशफ़िक़ ख़्वाजा

क़दम उठे तो अजब दिल-गुदाज़ मंज़र था

मुशफ़िक़ ख़्वाजा

क्यूँ ख़ल्वत-ए-ग़म में रहते हो क्यूँ गोशा-नशीं बेकार हुए

मुशफ़िक़ ख़्वाजा

यही नहीं कि वो बे-ताब-ओ-बे-क़रार गया

मुशफ़िक़ ख़्वाजा

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