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याक़ूब यावर

1952 | बनारस, भारत

याक़ूब यावर

अशआर 6

अगर वो आज रात हद्द-ए-इल्तिफ़ात तोड़ दे

कभी फिर उस से प्यार का ख़याल भी आएगा

शहर-ए-सुख़न अजीब हो गया है

नाक़िद यहाँ अदीब हो गया है

पहाड़ जैसी अज़्मतों का दाख़िला था शहर में

कि लोग आगही का इश्तिहार ले के चल दिए

लहू महका तो सारा शहर पागल हो गया है

मैं किस सफ़ से उठूँ किस के लिए ख़ंजर निकालूँ

तू ला-मकाँ में रहे और मैं मकाँ में असीर

ये क्या कि मुझ पे इताअत तिरी हराम हुई

ग़ज़ल 9

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aah ko chahiye ek umr asar hote tak SHAMSUR RAHMAN FARUQI

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