हमें सब अहल-ए-हवस ना-पसंद रखते हैं

अहमद मुश्ताक़

हमें सब अहल-ए-हवस ना-पसंद रखते हैं

अहमद मुश्ताक़

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    हमें सब अहल-ए-हवस ना-पसंद रखते हैं

    कि हम नवा-ए-मोहब्बत बुलंद रखते हैं

    इसी लिए तो ख़फ़ा हैं सितम-शिआर कि हम

    निगाह-ए-नर्म दिल-ए-दर्दमंद रखते हैं

    अगरचे दिल वही रजअत-पसंद है अपना

    मगर ज़बान तरक़्क़ी-पसंद रखते हैं

    हम ऐसे अर्श-नशीनों से वो दरख़्त अच्छे

    जो आँधियों में भी सर को बुलंद रखते हैं

    चले हो देखने 'मुश्ताक़' जिन को पिछली रात

    वो लोग शाम से दरवाज़ा बंद रखते हैं

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    नोमान शौक़

    नोमान शौक़,

    नोमान शौक़

    हमें सब अहल-ए-हवस ना-पसंद रखते हैं नोमान शौक़

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