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ऐश देहलवी

1779 - 1879 | दिल्ली, भारत

ग़ालिब की गज़लों के आलोचक

ग़ालिब की गज़लों के आलोचक

सीने में इक खटक सी है और बस

हम नहीं जानते कि क्या है दिल

कलाम-ए-मीर समझे और ज़बान-ए-मीरज़ा समझे

मगर उन का कहा ये आप समझें या ख़ुदा समझे

शम्अ सुब्ह होती है रोती है किस लिए

थोड़ी सी रह गई है इसे भी गुज़ार दे

बे-सबाती चमन-ए-दहर की है जिन पे खुली

हवस-ए-रंग वो ख़्वाहिश-ए-बू करते हैं