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अखिलेश तिवारी

1966 | जयपुर, भारत

ग़ज़ल 12

हिंदी ग़ज़ल 2

 

शेर 13

यहीं से राह कोई आसमाँ को जाती थी

ख़याल आया हमें सीढ़ियाँ उतरते हुए

हर-दम बदन की क़ैद का रोना फ़ुज़ूल है

मौसम सदाएँ दे तो बिखर जाना चाहिए

हँसना रोना पाना खोना मरना जीना पानी पर

पढ़िए तो क्या क्या लिक्खा है दरिया की पेशानी पर

ई-पुस्तक 1

आसमान होने को था

 

2012

 

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