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आमिर उस्मानी

1920 - 1975 | सहारनपुर, भारत

प्रमुख गद्यकार, व्यंग्यकार और शायर

प्रमुख गद्यकार, व्यंग्यकार और शायर

आमिर उस्मानी के शेर

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बाक़ी ही क्या रहा है तुझे माँगने के बाद

बस इक दुआ में छूट गए हर दुआ से हम

कितनी पामाल उमंगों का है मदफ़न मत पूछ

वो तबस्सुम जो हक़ीक़त में फ़ुग़ाँ होता है

उस के वादों से इतना तो साबित हुआ उस को थोड़ा सा पास-ए-तअल्लुक़ तो है

ये अलग बात है वो है वादा-शिकन ये भी कुछ कम नहीं उस ने वादे किए

सबक़ मिला है ये अपनों का तजरबा कर के

वो लोग फिर भी ग़नीमत हैं जो पराए हैं

इश्क़ के मराहिल में वो भी वक़्त आता है

आफ़तें बरसती हैं दिल सुकून पाता है

आबलों का शिकवा क्या ठोकरों का ग़म कैसा

आदमी मोहब्बत में सब को भूल जाता है

ज़ाहिरन तोड़ लिया हम ने बुतों से रिश्ता

फिर भी सीने में सनम-ख़ाना बसा है यारो

चंद अल्फ़ाज़ के मोती हैं मिरे दामन में

है मगर तेरी मोहब्बत का तक़ाज़ा कुछ और

मिरी ज़िंदगी का हासिल तिरे ग़म की पासदारी

तिरे ग़म की आबरू है मुझे हर ख़ुशी से प्यारी

अक़्ल थक कर लौट आई जादा-ए-आलाम से

अब जुनूँ आग़ाज़ फ़रमाएगा इस अंजाम से

हमें आख़िरत में 'आमिर' वही उम्र काम आई

जिसे कह रही थी दुनिया ग़म-ए-इश्क़ में गँवा दी

इश्क़ सर-ता-ब-क़दम आतिश-ए-सोज़ाँ है मगर

उस में शोला शरारा धुआँ होता है

ये क़दम क़दम बलाएँ ये सवाद-ए-कू-ए-जानाँ

वो यहीं से लौट जाए जिसे ज़िंदगी हो पियारी