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Annu Rizvi's Photo'

अन्नू रिज़वी

1968 | नोएडा, भारत

अन्नू रिज़वी के शेर

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यहाँ ग़रीब को सब कुछ तो दे दिया उस ने

ज़मीं बिछाए है और आसमान ओढ़े है

दरिया चढ़ा तो गाँव के गाँव बहा गया

उतरा तो कितने शहर के नक़्शे बना गया

उस को ये दिल भूल सकेगा मुश्किल लगता है

मुश्किल से तो जा के किसी से ये दिल लगता है

कभी तो बाढ़ के अपने साथ सब बहा गई

कभी किसान बारिशों की राह देखता रहा

मैं तो निकला था चराग़ों को जलाने के लिए

लोग कम-ज़र्फ़ थे दामन को बचा कर भागे

हर गाम पे दुश्वारी हर मोड़ पे पहरे हैं

अब आप से मिलने के दिन कितने सुनहरे हैं

अच्छे लोगों से मिल-जुल कर देखो ना

हम भी हैं हम से भी खुल कर देखो ना

ख़ुदा हमारी समा'अत को जब रसाई दे

वो जो भी सोचे हमें दूर से सुनाई दे

हमें ख़बर हुई और रात पहुँची

कहाँ से देखो कहाँ तक हयात पहुँची

मेरे उस के दरमियाँ कुछ बद-गुमानी गई।

फिर हक़ीक़त में वही झूटी कहानी गई

ये कैसे लोग हैं ये कौन सी 'अदावत है

ज़रा सी बात में जो ख़ानदान तक जाएँ

क़ातिल हो तुम हार मानो

जान है मुझ में बाक़ी और

आज वो कुछ और भी अच्छा लगा

उस का चेहरा मुझ को आईना लगा

राज़ है लेकिन फिर भी तुम को सच्ची बात बताते हैं

अपने घर के दिये से अक्सर हाथ मिरे जल जाते हैं

ज़ेहन में एक बात बैठ गई

अब वो उतरे तो कोई बात करें

मेरी आँखों में गई रात का मंज़र रख दे

मैं हूँ क़तरा मिरे पहलू में समुंदर रख दे

ज़मीन पाँव में और सर पे आसमान लिए

भटक रहा हूँ मैं इतना बड़ा मकान लिए

हमारे नाम ये पैग़ाम था कि जल जाओ

और उस के नाम के आगे बहार लिक्खा था

उसे हुनर है निगाहों से बात करने का

मैं बे-ज़बान सा लगता हूँ ये ज़बान लिए

दर-ए-रसाई भी अब बंद हो गया वर्ना

हम अपनी आँख से उस की ज़बान तक जाएँ

हमारे उस के दरमियाँ ये कैसा फ़ासला रहा

उसे भी सब ख़बर रही हमें भी सब पता रहा

अपने हाथों से ज़हर मत दीजे

ये कहीं ज़िंदगी बन जाए

कुछ ऐसा प्यास का ग़लबा था हर तरफ़ तारी

हर एक आँख से लब तक फ़ुरात पहुँची

मैं सूरज था मुझ को रात भिगो डाला

शबनम ने सारा मंज़र ही धो डाला

रौशनी उस घर की ज़ीनत बन गई

मेरे घर सूरज पे फिर पहरा लगा

जब इतने शौक़ से दुनिया नई बसाई थी

किसी चराग़ से फिर शर्त क्यूँ लगाई थी

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