धर्मेश सोलंकी के शेर
बिछड़ने वाले जिन में फिर से मिल जाएँ
वो फिल्में देखनी ही छोड़ दी हैं
बारिश के दिन नज़र यहाँ पल भर न आता मैं
वो मेरे साथ होती तो दफ़्तर न आता मैं
तुझ से शब भर कलाम करने को
एक तस्वीर तेरी काफ़ी है
पहले तो बर्बादियों का जश्न होना चाहिए
बा'द में आराम से अच्छे से रोना चाहिए
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भूलना इस लिए मुश्किल नहीं लगता मुझ को
मेरे सीने में ये दिल दिल नहीं लगता मुझ को
'उम्र भर अपने उसूलों पे ही चलता आया
सब गिराते रहे मुझ को मैं सँभलता आया
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टैग : ख़ुद्दारी
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दग़ा दे कर मुझे वो बेवफ़ा ता-'उम्र रोई
किसी का दिल दुखा कर ख़ुश नहीं रह सकता कोई
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टैग : बेवफ़ाई
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मिरे कमरे की बत्ती बंद हो तो तेरे हाथों से
वगर्ना छत पे तारे देख कर ही 'उम्र गुज़रेगी
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तुम्हें कुछ साल लेने चाहिएँ इंकार करने में
हमें 'उम्रें लगी हैं जुरअत-ए-इज़हार करने में
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टैग : इज़हार
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