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गोपालदास नीरज

1925 - 2018 | अलीगढ़, भारत

चित्र शायरी 3

अब तो मज़हब कोई ऐसा भी चलाया जाए जिस में इंसान को इंसान बनाया जाए जिस की ख़ुश्बू से महक जाए पड़ोसी का भी घर फूल इस क़िस्म का हर सम्त खिलाया जाए आग बहती है यहाँ गंगा में झेलम में भी कोई बतलाए कहाँ जा के नहाया जाए प्यार का ख़ून हुआ क्यूँ ये समझने के लिए हर अँधेरे को उजाले में बुलाया जाए मेरे दुख-दर्द का तुझ पर हो असर कुछ ऐसा मैं रहूँ भूका तो तुझ से भी न खाया जाए जिस्म दो हो के भी दिल एक हों अपने ऐसे मेरा आँसू तेरी पलकों से उठाया जाए गीत अनमन है ग़ज़ल चुप है रुबाई है दुखी ऐसे माहौल में 'नीरज' को बुलाया जाए

अब के सावन में शरारत ये मिरे साथ हुई मेरा घर छोड़ के कुल शहर में बरसात हुई आप मत पूछिए क्या हम पे सफ़र में गुज़री था लुटेरों का जहाँ गाँव वहीं रात हुई ज़िंदगी भर तो हुई गुफ़्तुगू ग़ैरों से मगर आज तक हम से हमारी न मुलाक़ात हुई हर ग़लत मोड़ पे टोका है किसी ने मुझ को एक आवाज़ तिरी जब से मिरे साथ हुई मैं ने सोचा कि मिरे देश की हालत क्या है एक क़ातिल से तभी मेरी मुलाक़ात हुई

 

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए
Gopal Das Niraj for Bahoot Khoob

गोपालदास नीरज

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