इशरत ज़फ़र

ग़ज़ल 15

शेर 8

वो इक लम्हा जो तेरे क़ुर्ब की ख़ुशबू से है रौशन

अब इस लम्हे को पाबंद-ए-सलासिल चाहता हूँ मैं

मिरे अक़ब में है आवाज़ा-ए-नुमू की गूँज

है दश्त-ए-जाँ का सफ़र कामयाब अपनी जगह

चार जानिब चीख़ती सम्तों का शोर

हाँपते साए थकन और इन्हितात

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वो मेरे राज़ मुझ में चाहता है मुन्कशिफ़ करना

मुझे मेरे घने साए में तन्हा छोड़ जाता है

मिरे कमरे की दीवारों में ऐसे आइने भी हैं

कि जिन के पास हर शख़्स अपना चेहरा छोड़ जाता है

पुस्तकें 13

Aakhri Darvesh

 

1993

Ehtisab

Anwar Sheikh Ki Ghazal Ka Tanqeedi-o-Taqabuli Mutala

2004

Fana Nizami

Fan Aur Shakhsiyat

2003

Haft Purkar

 

1984

Harf-e-Baryab

 

2007

Imshab

 

1990

Istifham

 

2014

Kulliyat-e-Shair

 

2013

Naqsh-e-Nawan

 

2008

Navishta

 

1983

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