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क़ौसर जायसी

1916 - 2005 | कानपुर, भारत

क़ौसर जायसी

ग़ज़ल 11

शेर 10

कभी कभी सफ़र-ए-ज़िंदगी से रूठ के हम

तिरे ख़याल के साए में बैठ जाते हैं

ये आरज़ू के सितारे ये इंतिज़ार के फूल

चमक रही हैं ख़ताएँ महक रहे हैं गुनाह

अपने ग़म की फ़िक्र की इस दुनिया की ग़म-ख़्वारी में

बरसों हम ने दस्त-ए-जुनूँ से काम लिया दानाई का

थी नज़र के सामने कुछ तो तलाफ़ी की उमीद

खेत सूखा था मगर दरिया में तुग़्यानी तो थी

तख़्लीक़ के पर्दे में सितम टूट रहे हैं

आज़र ही के हाथों से सनम टूट रहे हैं

पुस्तकें 2

Kamin Gah-e-Khayal

 

1981

Nishat-e-Fikr

Allama Kausar Jaisi Fan Aur Shakhsiyat

2006

 

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