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काज़िम रिज़वी

2003 | अलीगढ़, भारत

नौजवान शायरों में शुमार, ग़ज़ल में बर्जस्तगी का इज़हार

नौजवान शायरों में शुमार, ग़ज़ल में बर्जस्तगी का इज़हार

काज़िम रिज़वी

ग़ज़ल 8

नज़्म 10

अशआर 9

शायद वो इस बिना पे हमें बख़्श दे कि हम

काफ़िर बने रहे मुनाफ़िक़ नहीं हुए

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तेरी तरह ज़बान के कुछ तेज़ हम भी हैं

पर मसअला ये है कि अदब जानते हैं हम

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चलो माना कि ख़्वाबों में मिलोगे

मगर तुम बिन किसे नींद रही है

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लोग मेरी ग़ज़लों में तुम को ढूँढ़ लेते हैं

शे'र-ओ-शा'इरी कब है दास्ताँ तुम्हारी है

पहले होना था आइना दिल को

और फिर चूर-चूर होना था

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वीडियो 7

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शायर अपना कलाम पढ़ते हुए

काज़िम रिज़वी

काज़िम रिज़वी

काज़िम रिज़वी

काज़िम रिज़वी

काज़िम रिज़वी

काज़िम रिज़वी

काज़िम रिज़वी

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