काज़िम रिज़वी
ग़ज़ल 8
नज़्म 10
अशआर 9
लोग मेरी ग़ज़लों में तुम को ढूँढ़ लेते हैं
शे'र-ओ-शा'इरी कब है दास्ताँ तुम्हारी है
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aaj ik aur baras biit gayā us ke baġhair
jis ke hote hue hote the zamāne mere