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महशर इनायती

1909 - 1976 | रामपुर, भारत

रामपूर स्कूल के रंग मे शायरी करने वाले प्रतिष्ठित शायर

रामपूर स्कूल के रंग मे शायरी करने वाले प्रतिष्ठित शायर

उन का ग़म उन का तसव्वुर उन की याद

कट रही है ज़िंदगी आराम से

चले भी आओ मिरे जीते-जी अब इतना भी

इंतिज़ार बढ़ाओ कि नींद जाए

हर एक बात ज़बाँ से कही नहीं जाती

जो चुपके बैठे हैं कुछ उन की बात भी समझो

बड़ी तवील है 'महशर' किसी के हिज्र की बात

कोई ग़ज़ल ही सुनाओ कि नींद जाए

किसी की बज़्म के हालात ने समझा दिया मुझ को

कि जब साक़ी नहीं अपना तो मय अपनी जाम अपना

ग़ैर ही मुझे समझो दोस्त ही समझो

मिरे लिए ये बहुत है कि आदमी समझो

क़सम जब उस ने खाई हम ने ए'तिबार कर लिया

ज़रा सी देर ज़िंदगी को ख़ुश-गवार कर लिया

लब पे इक नाम हमेशा की तरह

और क्या काम हमेशा की तरह

सुनते थे 'महशर' कभी पत्थर भी हो जाता है मोम

आज वो आए तो पलकों को भिगोना पड़ गया

बातें करे है देखा करे है

मगर मेरे बारे में सोचा करे है

इक उन्हें देखो इक मुझे देखो

वक़्त कितना करिश्मा-कार सा है

अगर अपने दिल-ए-बेताब को समझा लिया मैं ने

तो ये काफ़िर निगाहें कर सकेंगी इंतिज़ाम अपना

मैं दीवाना सही लेकिन वो ख़ुश-क़िस्मत हूँ 'महशर'

कि दुनिया की ज़बाँ पर गया है आज नाम अपना