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माजिद देवबंदी

1964 | दिल्ली, भारत

ग़ज़ल 5

 

शेर 8

जिस को चाहें बे-इज़्ज़त कर सकते हैं

आप बड़े हैं आप को ये आसानी है

याद रक्खो इक इक दिन साँप बाहर आएँगे

आस्तीनों में उन्हें कब तक छुपाया जाएगा

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अफ़सोस जिन के दम से हर इक सू हैं नफ़रतें

हम ने तअल्लुक़ात उन्हीं से बढ़ा लिए

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पुस्तकें 3

Lahu Lahu Aankhein

 

2000

Shakh-e-Dil

 

2011

Zikr-e-Rasool

 

200

 

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