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मंज़र अय्यूबी

1932 - 2020 | कराची, पाकिस्तान

ग़ज़ल 6

शेर 2

किसी लब पे हर्फ़-ए-सितम तो हो कोई दुख सुपुर्द-ए-क़लम तो हो

ये बजा कि शहर-ए-मलाल में कोई 'फ़ैज़' है कोई 'मीर' है

किसी भी घर में सही रौशनी तो है हम से

नुमूद-ए-सुब्ह से पहले तो मत बुझाओ हमें

 

पुस्तकें 2

Mizaj

 

1987

Takallum

 

1981

 

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