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नुसरत ग्वालियारी

1938

ग़ज़ल 8

शेर 22

कुछ एहतियात परिंदे भी रखना भूल गए

कुछ इंतिक़ाम भी आँधी ने बदतरीन लिए

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रात के लम्हात ख़ूनी दास्ताँ लिखते रहे

सुब्ह के अख़बार में हालात बेहतर हो गए

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मैं अजनबी हूँ मगर तुम कभी जो सोचोगे

कोई क़रीब का रिश्ता ज़रूर निकलेगा

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पुस्तकें 2

Sab Khwab

 

1998

Saeban

 

1982