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राज़ इलाहाबादी

1929 - 1996 | इलाहाबाद, भारत

ग़ज़ल 7

शेर 4

अश्क-ए-ग़म ले के आख़िर किधर जाएँ हम आँसुओं की यहाँ कोई क़ीमत नहीं

आप ही अपना दामन बढ़ा दीजिए वर्ना मोती ज़मीं पर बिखर जाएँगे

आशियाँ जल गया गुल्सिताँ लुट गया हम क़फ़स से निकल कर किधर जाएँगे

इतने मानूस सय्याद से हो गए अब रिहाई मिलेगी तो मर जाएँगे

ये मेरी तमन्ना है प्यासों के मैं काम आऊँ

यारब मिरी मिट्टी को पैमाना बना देना

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ई-पुस्तक 2

Dhadkanein

 

1978

Rang-o-Noor

 

1966

 

वीडियो 5

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