ग़ज़ल 19

शेर 16

है एक उम्र से ख़्वाहिश कि दूर जा के कहीं

मैं ख़ुद को अजनबी लोगों के दरमियाँ देखूँ

ज़माने भर से उलझते हैं जिस की जानिब से

अकेले-पन में उसे हम भी क्या नहीं कहते

ज़रूरत उस की हमें है मगर ये ध्यान रहे

कहाँ वो ग़ैर-ज़रूरी कहाँ ज़रूरी है

रौशनी है किसी के होने से

वर्ना बुनियाद तो अंधेरा था

उन से बचना कि बिछाते हैं पनाहें पहले

फिर यही लोग कहीं का नहीं रहने देते

पुस्तकें 2

Aafrinash

 

1985

Ungliyon Par Ginti Ka Zamana

 

1983

 

चित्र शायरी 1

जिस को तय कर न सके आदमी सहरा है वही और आख़िर मिरे रस्ते में भी आया है वही ये अलग बात कि हम रात को ही देख सकें वर्ना दिन को भी सितारों का तमाशा है वही अपने मौसम में पसंद आया है कोई चेहरा वर्ना मौसम तो बदलते रहे चेहरा है वही एक लम्हे में ज़माना हुआ तख़्लीक़ 'मलाल' वही लम्हा है यहाँ और ज़माना है वही

 

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