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सरदार सलीम

1973

सरदार सलीम

ग़ज़ल 11

शेर 7

कुछ ऐसा हो कि तस्वीरों में जल जाए तसव्वुर भी

मोहब्बत याद आएगी तो शिकवे याद आएँगे

फ़िक्र एहसास के तपते हुए मंज़र तक

मेरे लफ़्ज़ों में उतर कर मिरे अंदर तक

आज दीवाने का ज़ौक़-ए-दीद पूरा हो गया

तुझ को देखा और उस के बाद अंधा हो गया

बादशाहत के मज़े हैं ख़ाकसारी में 'सलीम'

ये नज़ारा यार के कूचे में रह के देखना

'ग़ालिब'-ए-दाना से पूछो इश्क़ में पड़ कर सलीम

एक माक़ूल आदमी कैसे निकम्मा हो गया

पुस्तकें 3

Dhyan Ki Rehl

 

2003

रात रानी

 

2006

Shumara Number-004,005

1959