सरवर आलम राज़

ग़ज़ल 12

शेर 9

आरज़ू हसरत और उम्मीद शिकायत आँसू

इक तिरा ज़िक्र था और बीच में क्या क्या निकला

आग़ाज़-ए-मोहब्बत से अंजाम-ए-मोहब्बत तक

''इक आग का दरिया है और डूब के जाना है'

बे-कैफ़ जवानी है बे-दर्द ज़माना है

नाकाम-ए-मोहब्बत का इतना ही फ़साना है

शौक़ है तुझ को ज़माने में तिरा नाम रहे

और मुझे डर है मोहब्बत मिरी बद-नाम हो

देख ये जज़्ब-ए-मोहब्बत का करिश्मा तो नहीं

कल जो तेरे दिल में था वो आज मेरे दिल में है

पुस्तकें 6

Baqiyat-e-Raz

 

 

दुर-ए-शहवार

 

2004

Rang-e-Gulnar

 

 

Shahr-e-Nigar

 

1993

Teesra Hath

 

1999

Teesra Hath

 

2004

 

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